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आरोपी हो रसूखदार, तो कानूनी दांवपेंच उलझाती है पुलिस

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सहारनपुर। पुलिस के जांच के तरीके भी निराले हैं। आरोपी कोई रसूखदार हो तो पुलिस कानूनी पेचीदगियों में उलझा देती है, आरोपी को पूरा मौका अपने बचाव के लिए मिलता है, गिरफ्तारी से बचने के लिए कोर्ट से स्टे लाने का भी मौका तक दे दिया जाता है। ऐसा एक नहीं, बल्कि कई मामलों में सामने आ चुका है।
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सहारनपुर जनपद में कुछ समय में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें आरोपी प्रभावशाली होने पर कार्रवाई के नाम पर पुलिस हिचकती नजर आई। हाल में ही समाजवादी पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष मजाहिर हसन मुखिया, उनके बेटे और दस अज्ञात लोगों पर सरकारी कर्मियों की पिटाई का मामला दर्ज हुआ। राजनीतिक लोगों ने मजाहिर हसन मुखिया के पक्ष में आवाज उठाई, तो पुलिस भी कार्रवाई के नाम पर ठिठक गई। मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी तक नहीं की गई। दूसरा मामला भी कुतुबशेर थाना क्षेत्र का ही है। मानकमऊ के निकट मोहल्ला चंद्र विहार में हुए विस्फोट में मां और बेटी की मौत हो गई थी। इस मामले में अनधिकृत रूप से विस्फोटक सामग्री बनवाने एवं गैर इरादतन हत्या के आरोप में चोपड़ा फायर वर्क्स के मालिक सुभाष चोपड़ा, हनी, महेश और लक्ष्मण के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। लक्ष्मण अन्य लोगों की फैक्ट्रियों से विस्फोटक लोगों के यहां पहुंचाकर पटाखे बनवाता था। जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, लेकिन सुभाष चोपड़ा, हनी और महेश के खिलाफ कार्रवाई में तेजी नहीं दिखाई और करीब 15 दिन तक मामला ठंडे बस्ते में रहा। इसके चलते सुभाष चोपड़ा गिरफ्तारी पर स्टे ले आया। वहीं, नगर निगम में लिपिक को थप्पड़ मारने का मामला जिले में चर्चा का विषय बना रहा। कर्मचारियों ने हड़ताल की चेतावनी तक दी थी, लेकिन कुतुबशेर थाना पुलिस ने नामजद आरोपी पर कार्रवाई नहीं की। आरोपी के प्रभावशाली होने के कारण उसे मौका दिया गया। बाद में आरोपी ने कोर्ट से गिरफ्तारी पर स्टे ले लिया। इस मामले में पुलिस ने थप्पड़ प्रकरण के दौरान वीडियो बनाने और उस वीडियो को वायरल करने के आरोप में एक युवक को गिरफ्तार कर इतिश्री कर ली थी। इसके अलावा नागल में हुए गेहूं व्यापारी के यहां डकैती के मामले में भी पुलिस की उदासीनता का फायदा आरोपी सिपाहियों शायर बेग और रिंकू ने उठाया। दोनों को तलाश करने में पुलिस की ढील का फायदा उठाया और हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर स्टे ले लिया।
एसपी सिटी विनीत भटनागर का कहना है कि कुछ मामलों में विवेचना के आधार पर कार्रवाई की जाती है, जबकि कुछ मामलों में त्वरित कार्रवाई जरूरी होती है। मामले की गंभीरता के आधार पर कार्रवाई होती है।
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