चुनाव के प्रचार से संबंधित फोटो
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सहारनपुर। सोशल मीडिया और कोरोना काल में चुनाव प्रचार का स्वरूप बदल गया है। कभी बिल्लों के जरिए चुनाव का प्रचार होता था। प्रत्याशी लाखों की संख्या में बिल्ले छपवाकर घर-घर बांटते थे, लेकिन अब बिल्लों का चलन खत्म हो गया है। ऐसे में प्रिंटिंग प्रेस कारोबारियों के व्यापार पर भी फर्क पड़ा है।
दो दशक पूर्व चुनाव प्रचार के दौरान बिल्लों की अहम भूमिका रहती थी। प्रत्याशी विशेष आर्डर पर कागज, प्लास्टिक और शर्ट में पिन के जरिए लगाने वाले लोहे के बिल्ले भी तैयार कराते थे। जनसंपर्क के दौरान घर-घर बिल्ले बांटे जाते थे। बच्चों में बिल्ले का विशेष क्रेज होता था। मगर, अब बिल्लों के दम चुनाव लड़ने की योजना बीते जमाने की बात हो गई।
कारोबार पर पड़ा फर्क
प्रिंटिंग प्रेस कारोबारी जितेंद्र कश्यप और मोहित अग्रवाल बताते हैं कि विशेष आर्डर पर प्रत्याशी बिल्ले तैयार कराते थे। लाखों की संख्या में कागज, प्लास्टिक और लोहे के बिल्ले बनाए जाते थे। इससे कारोबार में इजाफा होता था, लेकिन अब चुनाव प्रचार में बिल्लों का चलन खत्म होने से कारोबार में गिरावट आई है।
दल व प्रत्याशी को मिलती थी मदद
भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक लाज कृष्ण गांधी, भाजपा वरिष्ठ नागरिक प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक केएल अरोड़ा बताते हैं कि वर्ष 2000 तक बिल्लों का चलन रहा। प्रत्याशी लाखों की संख्या में बिल्ले छपवाकर बांटते थे। इससे संगठन और उम्मीदवार को चुनाव प्रचार में काफी मदद मिलती थी। वहीं, कांग्रेस के पूर्व मंडलीय प्रवक्ता नरेंद्र शर्मा का कहना है कि बिल्लों के जरिए प्रत्याशी चुनाव लड़ते थे। जनसंपर्क और जलसों के दौरान लाखों बिल्ले बांट दिए जाते थे। कार्यकर्ता व समर्थकों में भी बिल्ले लेने को होड़ मचती थी। प्रचार का वह तरीका ज्यादा आसान था। क्योंकि, अब भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो सोशल मीडिया से दूर हैं।