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हजरत कासिम की शहादत पर जार-जार रोए शिया सोगवार

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हजरत कासिम अलैहिस्सलाम के शबीह ताबूत की जियारत करते सौगवार। - फोटो : SAHARANPUR
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हजरत कासिम की शहादत पर जार-जार रोए शिया सोगवार
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सहारनपुर। नगर की विभिन्न इमाम बारगाह में मोहर्रम की पांच तारीख की रात और 6 मोहर्रम के दिन मजलिसों में हजरत कासिम की शहादत बयां की गई। शिया सोगवार जार-जार रोए।
पहली मजलिस इमाम बारगाह सामानियान मोहल्ला कायस्थान में हुई। मौलाना जहूर मेहंदी मौलाई ने खिताब फरमाया। दूसरी मजलिस बड़ी इमाम बारगाह जाफर नवाज में हुई, मौलाना शब्बर हुसैन खान ने खिताब फरमाया। तीसरी मजलिस छोटी इमाम बारगाह में हुई, सालिम काजमी साहब ने खिताब फरमाया। चौथी मजलिस फरहत मेहंदी के मकान पर हुई, मौलाना जहूर मेहंदी ने खिताब फरमाया। पांचवीं मजलिस प्यारे मियां के मकान पर हुई, सालिम काजमी ने खिताब फरमाया।
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मजलिस में हजरत कासिम की शहादत पर फलसफा बयान करते हुए बताया कि हजरत कासिम की उम्र 13 साल थी। उनसे इमाम हुसैन बहुत प्यार करते थे। जब करबला में शहादत का वक्त आया तो हजरत कासिम ने इमाम हुसैन से शहादत की इजाजत लेनी चाही। हजरत इमाम हुसैन ने अपने भाई की इकलौती निशानी होने के कारण शहादत की इजाजत नहीं दी। हजरत कासिम ने अपने बाजू पर बंधा अपने वालिद हजरत इमाम हसन का तावीज अपने चचा हजरत इमाम हुसैन को दिखाया, जिसमें हजरत इमाम हसन ने अपनी जिंदगी में शहादत की इजाजत लिखकर अपने बेटे के बाजू पर बांध दी थी। हजरत इमाम हसन को पहले ही पता था कि उनके छोटे भाई इमाम हुसैन को करबला में शहादत की जरूरत होगी। अपने बड़े भाई की वसीयत को देखते हुए हजरत इमाम हुसैन ने हजरत कासिम को शहादत की इजाजत दे दी। हजरत कासिम बड़ी बहादुरी से जंग लड़े। यजीद की फौज ने उनको चारों तरफ से घेरकर शहीद कर दिया और लाश पर घोड़े दौड़ाया। यह सुनकर सोगवारों की आंखों से आंसू बह निकले।
मजलिस में फरहत मेहंदी, चांद जैदी, आसिफ हैदर, डाक्टर जेडए कौसर, इंतजार मेहंदी, काजी अकरम, प्यारे मियां, सकलैन रजा, फरहत हुसैन, जैगम अब्बास, ख्वाजा रईस अब्बास, जिया अब्बास, रियाज हैदर, मिर्जा अहसान, अजहर काजमी, मेहताब अली, रियासत हवारी, आसिफ हवारी, फिरोज हैदर, जमीर काजमी, रईस काजमी, कौसर अब्बास, समीर हैदर, नदीम जैदी, फराज जैदी, अबुतालिब, डॉक्टर एमएम जैदी, अरशद अजीज, नुसरत अजीज, अनवार जैदी, आदि मौजूद रहे।
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गाइडलाइन का किया पालन, नहीं निकाला जुलूस
मोहर्रम की पांच व छह तारीख पर हर साल बाजारों में मातमी जुलूस निकाला जाता था, लेकिन बीते वर्ष और इस बार भी कोविड गाइडलाइन के चलते जुलूस नहीं निकाला गया। हजरत कासिम की याद में शबीह ताबूत इमामबाड़ा के अंदर ही निकाला गया।
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