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Saharanpur News: खेलने-कूदने की उम्र में जा रहे खून चढ़वाने, 150 बीमारी से ग्रस्त

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सहारनपुर। खेलने-कूदने की उम्र में बच्चे एसबीडी जिला अस्पताल में खून चढ़वाने जा रहे हैं। यह कोई ऐसी बीमारी नहीं, जिसका इलाज कुछ महीनों या वर्षों में हो जाए। अब यह खून चढ़वाने का सिलसिला ताउम्र चलेगा। इसलिए थैलेसीमिया बीमारी के खात्मे को शादी से पहले स्वास्थ्य कुंडली मिलाना बेहद जरूरी है।
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विश्व थैलेसीमिया दिवस बृहस्पतिवार को है। एसबीडी जिला अस्पताल में इस समय 150 रोगियों का इलाज चल रहा है। बच्चा वार्ड में थैलेसीमिया के लिए 12 बेड का स्पेशल वार्ड बनाया गया है। नोडल अधिकारी एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विरेंद्र भट्ट ने बच्चों का इलाज कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि रोजाना 10 से 15 बच्चों को खून चढ़ाना पड़ता है। थैलेसीमिया से ग्रस्त मरीजों के लिए खून की व्यवस्था अलग से रहती है। खास बात यह है कि खून के बदले खून नहीं लिया जाता है। कुछ दवाएं दी जाती हैं, जो पर्याप्त मात्रा में अस्पताल में उपलब्ध हैं।
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थैलेसीमिया के लक्षण

माइनर थैलेसीमिया - इसमें अधिकतर मामलों में कोई लक्षण नजर नहीं आता हैं। कुछ रोगियों में रक्त की कमी या एनीमिया हो सकता हैं।

- मेजर थैलेसीमिया - जन्म के तीन महीने बाद कभी भी इस बीमारी के लक्षण नजर आ सकते हैं। बच्चों के नाखून और जीभ पीली पड़ जाने से पीलिया का भ्रम पैदा हो जाता हैं। बच्चे के जबड़ों और गालों में असमानता आ जाती है। बच्चे का विकास रुक जाता है और वह उम्र से काफी छोटा नजर आता है।
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थैलेसीमिया होने के कारण

थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रोग है। रक्त में हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है। पहला अल्फा और दूसरा बीटा ग्लोबिन। दोनों में से किसी प्रोटीन के निर्माण वाले जींस में गड़बड़ी होने पर थैलेसीमिया रोग होता हैं। इस रोग में शरीर में लाल रक्त कण/ रेड ब्लड सेल(आरबीसी) नहीं बन पाते हैं और जो थोड़े बन पाते हैं वह केवल थोड़े समय तक ही रहते हैं। थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसा न करने पर बच्चा जीवित नहीं रह पाता।
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