सहारनपुर। जन-जन के राम रामायण कॉन्क्लेव में मुख्य वक्ता पंडित राघवेंद्र स्वामी ने कहा कि सत्संग को किसी जाति, समुदाय या धर्म विशेष से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। जिन पर प्रभु की विशेष कृपा होती है वे ही संतों का संग पाते हैं। उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का दायरा सीमित नहीं है। श्रीराम के जीवन से हमें प्यार, जीने का तरीका, नेतृत्व और त्याग आदि सब कुछ सीखने को मिलता है।
बुधवार को जनमंच प्रेक्षागृह में पर्यटन और संस्कृति विभाग तथा जिला प्रशासन की ओर से जन-जन के राम रामायण कॉन्क्लेव का भव्य आयोजन कराया गया। रामकथा में ऋषि परंपरा पर परिचर्चा हुई। उसमें पंडित राघवेंद्र स्वामी ने कहा कि संतों का स्वरूप उनके परिधान तक ही सीमित नहीं होता। संतों को धर्म से न जोडे़ं। जब जब पृथ्वी पर दुष्टता की भावना बढ़ती है तब ऋषियों और संतों की जिम्मेदारी उस भावना को रोकने की होती है। भारत की संस्कृति किसी भी रूप में दुष्टता को स्वीकार नहीं करती है। उन्होंने कहा कि दूसरों का हित करने का भाव जिसके मन में होता है वही ऋषियों की परंपरा में शामिल होता है। उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की महत्ता को भी विस्तार से बताया।
कार्यक्रम में पंडित दीपक अग्निहोत्री तथा पंडित प्रदीप कौशिक ने राम कथा में ऋषि परंपरा के बारे में बताया। पंडित नीलकंठ शर्मा द्वारा राम कथा पर आधारित भजन सुनाए गए। कलाकारों द्वारा भजन, लोक गायन, रागिनी, लोक नृत्य तथा जय सियाराम नाटक का भी मंचन किया गया। इसका लेखन, परिकल्पना, संगीत एवं निर्देशन अमित दीक्षित ने दिया। लखनऊ से आए कलाकारों के भजनों ने मन मोह लिया।
कार्यक्रम में अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) डॉ. अर्चना द्विवेदी, उप जिलाधिकारी एसएन शर्मा, संस्कृति विभाग के संग्रहालयाध्यक्ष पतरू मौर्य, जिला विद्यालय निरीक्षक रविदत्त, तहसीलदार सदर गोपेश तिवारी, विद्यालयों के बच्चे तथा अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
जन ंच में आयोजित जन-जन के राम रामायण कॉन्क्लेव कार्यक्रम में बनायी गयी कलाकृति्- फोटो : SAHARANPUR
जनमंच में आयोजित जन-जन के राम रामायण कॉन्क्लेव कार्यक्रम में भजन गाते कलाकार- फोटो : SAHARANPUR