देवबंद। बुलडोजर कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जमीयत उलमा-ए-हिंद के दोनों गुटों ने स्वागत किया है। मौलाना अरशद मदनी और मौलाना महमूद मदनी ने संयुक्त रूप से ऐतिहासिक निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि यह न्याय की हत्या करने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। साथ ही कोर्ट का यह कहना है कि कोई व्यक्ति दोषी है या नहीं यह तय करना न्याय पालिका का काम है, सराहनीय है।
सुप्रीम फैसले पर बुधवार को जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने बुलडोजर कार्रवाई को असांविधानिक करार देकर गरीबों और मजलूमों को न्याय देने का काम किया है। साथ ही जमीयत का संघर्ष भी सफल हुआ है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों के उल्लंघन पर अदालत की यह तल्ख टिप्पणी एक सबक है, जिसमें कहा गया कि सरकारें जज नहीं बन सकतीं। साथ ही अदालत ने अवैध बुलडोजर एक्शन में शामिल अधिकारियों को दंडित करने का आदेश जारी कर पीड़ितों को इंसाफ दिलाया है। उन्होंने कहा कि अदालत ने यह भी कहा कि बुलडोजर चलाकर किसी का घर तोड़ना सजा नहीं अपराध है। अधिकारी जज नहीं बन सकता, वैधानिकता और अवैधता न्यायपालिका तय करेगी। मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि न्यायालय ने इस मामले के फैसले में सांविधानिक और कानूनी पहलुओं को पूरी तरह से उजागर किया गया है। जमीयत के दूसरे गुट के अध्यक्ष व इस मुकदमे के प्रथम याचिकाकर्ता मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि कौन दोषी है कौन नहीं यह अदालत तय करेगी। प्रशासन किसी को दोषी नहीं ठहरा सकता। यदि प्रशासन द्वारा केवल आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति की संपत्ति को ध्वस्त किया जाता है, तो यह कानून के शासन को कमजोर कर देगा।
उन्होंने फैसले को कानून के शासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि बुलडोजर न्याय के घृणित कार्य से सरकारें भी बेदाग नहीं हैं, उम्मीद है कि सरकारें इस फैसले से सबक लेंगी। मौलाना मदनी ने इस बात पर जोर दिया कि उन सभी लोगों को मुआवजा दिया जाना चाहिए जिनकी संपत्ति कानूनी प्रक्रिया के बिना ध्वस्त की गई हैं।