धान ने इस बार किसान के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। इस बार धान का रेट मंडियों में काफी कम रह गया है। इस बार तो 2000 रुपये प्रति क्विंटल तक भी रेट नहीं पहुंच पाया। जबकि उसके धान का चावल ही उसे बाजार से कई गुना रेट में खरीदना पड़ रहा है। इस स्थिति को देखकर किसान परेशानी में है।
जिले में धान का रकबा लगभग 68 हजार हेक्टेयर है। यहां गन्ने के साथ-साथ धान की खेती भी प्रमुखता से की जा रही है, लेकिन दो साल से धान ने किसानों के लिए मुसीबत ला दी है। इस बार धान की पैदावार तो काफी अच्छी रही, लेकिन किसानों को मंडी में धान का रेट ही नहीं मिल पा रहा है।
पूसा वन और 1121 का रेट 2000 रुपये भी नहीं मिल पा रहा है। जबकि ये धान की अच्छी क्वालिटी में शुमार है। धान के किसानों की यह हालत दो वर्षों से हो रही है। पिछले वर्ष मोटा धान का सरकारी रेट 1450 रुपये रखा गया था। जिले और आसपास की मंडियों में अधिकतम रेट 1950 तक ही मिल सका था।
मंडी सचिव अनिल कुमार के अनुसार इस बार सरकारी रेट 1570 रुपये तक है। जबकि कुछ किसान आढ़तियों से सीधे संपर्क कर रहे हैं। उन्हें अधिकतम कीमत 2000 से 2200 तक ही मिल पा रही है। जबकि इससे पूर्व पांच हजार प्रति क्विंटल तक किसानों को धान का रेट मिल रहा था।
इससे उलट बाजार में चावल का रेट कम नहीं हो पा रहा है। किसी भी प्रकार का बासमती चावल 6000 रुपये प्रति क्विंटल से कम नहीं है। किसानों को अपने ही धान का चावल कई गुना रेट में बाजार से खरीदना पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धान में 70 प्रतिशत से अधिक चावल होता है। उसके अनुसार किसानों को उनके धान का रेट न के बराबर ही मिल रहा है।
सरकारी रेट से कम नहीं मिलेगा किसानों को रेट
मंडी समिति सचिव अनिल कुमार का कहना है कि धान के रेट इस बार कुछ सुधरने की उम्मीद है। किसानों को सरकारी रेट से कम रेट नहीं मिलेगा। हालांकि मंडी में कुछ किसानों को 2000 रुपये से अधिक कीमत भी मिल रही है। लेकिन तीन वर्ष पूर्व की अपेक्षा यह काफी कम है।
धान तो अब बर्बाद ही कर रहा है
सहारनपुर। सरसावा के किसान नरेंद्र सिंह कहते हैं कि उन्होंने 10 बीघा में धान की खेती की। लेकिन नुकसान काफी उठाना पड़ा। उन्हें इस बार लागत भी नहीं मिल पा हरी है। मंडी में लेकर गए तो रेट 1800 रुपये का भाव मिला। कम से कम 3000 रुपये का रेट मिले तो लागत मिल पाएगी। चिलकाना के किसान जगपाल सिंह भी धान के रेट को लेकर काफी परेशान हैं। उन्होंने बताया कि पिछली बार के रेट देखते हुए उन्होंने इस बार कम धान बोया।
वह रेट बढ़ने के इंतजार में अपने धान को रखे हुए हैं। अहमदपुर के किसान जमील अहमद का कहना है कि धान की फसल ने तो बर्बाद ही कर दिया। अब तो धान की फसल ही खत्म करनी पड़ेगी। मंडी तक पहुंचाने का किराया भी जेब से ही देना पड़ रहा है। जब नुकसान ही हो रहा है तो ऐसी फसल से क्या लाभ। अगली बार कोई दूसरी फसल ही बोएंगे।