देवबंद। जमीयत दावतुल मुसलीमीन के लिए रोजेदारों के लिए शुरू की गई हेल्पलाइन पर एक सवाल के जवाब में उलमा ने शरीयत का हवाला देते हुए कहा कि रोजे की हालत में अगर दांत से खून निकल जाए तो रोजा नहीं टूटेगा। सोमवार को हेल्पलाइन पर मजहब-ए-इस्लाम में जकात की अहमियत के बारे में बताते हुए मौलाना कारी इस्हाक गोरा ने कहा कि इस्लाम में जकात की अहमियत नमाज और रोजे जितनी है। जकात इस्लाम का अहम भाग है और ये हर साहिब-ए-निसाब (संपत्ति के योग्य) मुसलमान पर फर्ज है।
सवाल : गाजियाबाद निवासी इरशाद अहमद ने पूछा कि उनके दांतों में कुछ फंसा हुआ था, जिसे निकालते समय अचानक खून निकल आया। क्या उनका रोजा बाकी रहेगा।
जवाब : अगर रोजे की हालत में दांत से खून निकले, लेकिन वह हल्क (गले) में न जाए, तो रोजे पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह सही-सलामत रहेगा। अगर खून हल्क में चला जाए, तो रोजा टूट जाएगा। इसलिए रोजेदार को चाहिए कि वह एहतियात बरते।
सवाल : जगाधरी (यमुनानगर) निवासी अब्दुल गफ्फार ने पूछा कि उनके परिवार में कई पीढ़ियों से रोजा नमक और अदरक से इफ्तार करने का रिवाज है। क्या यह सुन्नत है।
जवाब : मौलाना कारी इस्हाक ने स्पष्ट किया कि यह एक गलतफहमी है और शरीयत में इसका कोई आधार नहीं है। सुन्नत यह है कि रोजा खजूर से इफ्तार किया जाए और अगर खजूर न मिले तो पानी से इफ्तार करना बेहतर है। जो लोग नमक या अदरक से रोजा खोलने को सुन्नत या मुस्तहब (पसंद किया गया) समझते हैं, यह उनकी कम इल्मी की निशानी है।
सवाल : सहारनपुर के नखासा बाजार के मुकीम ने पूछा कि अगर कोई व्यक्ति मस्जिद के इमाम की बुराई करता है, लेकिन फिर भी उन्हीं के पीछे नमाज पढ़ता है और उनसे मिलते हुए मुस्कुराकर मिलता है, तो शरीयत में उसका क्या हुक्म है।
जवाब : इस्लाम में ऐसा रवैया मुनाफिकत (दिखावे की प्रवृत्ति) की निशानी माना जाता है। ऐसे शख्स को चाहिए कि अपनी नमाज की फिक्र करें और अपने अमल की इस्लामी नजरिए से समीक्षा करें। सलाह है कि ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि वह दारुल इफ्ता से मामले में तफ्सीली (विस्तृत) फतवा हासिल करें।