ये न कहो थकान बाकी है, हौसलों में अभी उड़ान बाकी है।...चलो सलाम करें उनके हौसलों को सपन, जो आंधियों में भी तिनकों के घर बनाते हैं। जी हां! रचनाकार सुरेश सपन की यह पंक्तियां खुद उनके जीवन पर फिट बैठती हैं।
शरीर से आधे हो चुके सपन मन और जीवटता से पूरे ही नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक हैं। वास्तव में उनका जीवन संघर्ष जिंदगी से मोह छोड़ चुके किसी भी व्यक्ति के लिए सीख है, जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीने का।
सुरेश सपन का जन्म सर्राफ रूपचंद वर्मा और चंपा देवी के घर सात मार्च 1947 को हुआ। हिंदी से एमए के बाद उन्होंने कुछ समय तक पिता के साथ काम किया।
इसके बाद उनको विद्युत विभाग में सरकारी नौकरी मिली। सेवा पूरी करने के बाद 2005 में वह सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन, ठीक एक साल बाद वर्ष 2006 में ईश्वर ने उनसे उनकी धर्मपत्नी विजय को छीन लिया। पत्नी के जाने के बाद अंदर से आधा टूट चुके सुरेश सपन ने अपने तीन बच्चों को कभी मां की कमी का अहसास नहीं होने दिया।
लिखने का शौक उन्हें कॉलेज टाइम से ही था, मगर नौकरी में रहते हुए वह लेखन को पूरा समय नहीं दे सके। ऐसे में उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद कलम को पूरी तरह से थाम लिया और लिखना शुरू किया। दिनभर लिखते रहने की वजह से उन्हें अकेलेपन का भी अहसास नहीं रहता था।
नतीजा यह हुआ कि कड़ी मेहनत के दम पर वर्ष 2008 में उनका गजल संग्रह तल में हलचल मची है सामने आया। इस गजल संग्रह के ठीक दो साल बाद वर्ष 2010 में उनकी पुस्तक रामकथा आई, जिसमें दोहों के माध्यम से बाल कांड से लेकर उत्तर कांड तक का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में कुल 1700 दोहे शामिल हैं।
इसी साल उनकी जिंदगी ने एक दुखद करवट ली। भारी शुगर की वजह से उनके पैर की उंगलियों में इंफेक्शन हो गया। इंफेक्शन आगे न बढ़े। इसके लिए डॉक्टर ने उनकी उंगलियों को शरीर से अलग कर दिया। लेकिन, इसके बाद भी इंफेक्शन का बढ़ना बंद नहीं हुआ, जिसके बाद डॉक्टर ने उनके दोनों पैर काट दिए। इसी प्रकार लगातार पांच बार उनकी टांगों को काटा गया। पांचवीं बार उनकी टांगे घुटनों के ऊपर से काटकर अलग कर दी गई।
अच्छी बात यह है कि अब वह स्वस्थ हैं। लगातार पांच बार अपने शरीर को खुद से अलग होता देख कोई भी व्यक्ति अंदर से टूट सकता था, मगर उनसे मिलकर कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि जिंदगी द्वारा उनके साथ किए गए खिलवाड़ से वह दुखी हैं। आज भी वह जिंदादिली के साथ जिंदगी जी रहे हैं, जिनकी भाषा में विनम्रता और मिठास है, जो उन्हें सबका प्रिय बनाती है।
आज भी उनका लेखन जारी है। वर्तमान में वह बिस्तर पर बैठे हुए लड्डू भइया के नाम से बच्चों पर काव्य संकलन कर रहे हैं, जिसके जल्द ही पूरा होने की बात उन्होंने कही है। इस संकलन की दो पंक्तियां यह भी हैं कि
बच्चे जब तुतलाकर मुझसे बात करते हैं,
तब बच्चों के संग बच्चा होना अच्छा लगता है।
इसके अलावा वह तो मन मधुमास हो गया नाम से एक गीत संकलन भी कर रहे हैं, जिसका काम अंतिम दौर में है। वर्तमान में गीत, गजल, मुक्तक, लोकगीत, हास्य और बाल कविता लिखने में सहारनपुर और आसपास के जनपदों में उनका कोई सानी नहीं।
इन संस्थाओं से जुड़े हैं सपन
सुरेश सपन समन्वय, विभावरी, नीरजा स्मृति, बाल साहित्य न्यास, सम्यक, मकसद आदि संस्थाओं से जुड़े हैं। अनेक पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अलावा आकाशवाणी पर उनकी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है। उनके कार्य की वजह से अनेक संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं।