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पत्रकारों पर दर्ज मुकदमें 30 साल बाद हुए खत्म

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गंगोह/सहारनपुर। राम मंदिर आंदोलन के दौरान पत्रकारों पर दर्ज हुए मामले तीस साल बाद खत्म हुए। मुकदमे वापसी के शासनादेश को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने पत्रकारों पर दर्ज मामले खत्म कर दिए। इन पत्रकारों पर रासुका भी लगी थी।
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गंगोह निवासी पत्रकार डॉ. राकेश गर्ग ने बताया कि वर्ष 1987 में कोर्ट के आदेश पर अयोध्या स्थित रामलला के मंदिर के ताले खोले गए थे। नागरिकों ने बाजारों को सजाने के अलावा प्रतिष्ठानों और घरों पर भगवा झंडे लगाए थे। तब, पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों ने जबरन झंडे व बैनर उतरवाए थे। इससे नाखुश व्यापारियों ने प्रतिष्ठान बंद कर सड़कों प्रदर्शन किया था। बाद में तत्कालीन एसडीएम ने खेद जताकर ध्वजारोहण कर बाजार खुलवाए थे। गंगोह में श्री राम की शोभायात्रा को रोकने पर तनातनी का माहौल बन गया था। पुलिस-प्रशासन ने कवरेज कर रहे पत्रकारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी, जिसमें डॉ. राकेश गर्ग और राकेश गोयल को नामजद कर जेल भेजा गया था। इसके बाद इन पर रासुका लगा दी गई थी। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेेेश के कई जिलों में पत्रकारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई थी। इसको लेकर तब संघर्ष समिति अध्यक्ष पत्रकार राव इकबाल, पत्रकार बलबीर तोमर व प्रमोद भारती के नेतृत्व में आंदोलन चला था। राकेश गर्ग ने बताया कि प्रशासन ने रासुका हटाकर 15 मई 1987 को रिहा तो कर दिया था, लेकिन मुकदमे खत्म नहीं किए थे। इसके बाद मामले खत्म करने को शासनादेश जारी हुआ था, जिसके क्रियान्वयन में 30 साल लग गए। अब पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामले खत्म किए गए हैं। इसमें बार संघ के जिलाध्यक्ष अभय सैनी का भी योगदान रहा।
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