सहारनपुर। जिले में पर्यटन के लिहाज से बहुत से स्थल है, जो बेहद प्राचीन और पौराणिक हैं। इन स्थलों के साथ जुड़ी किवदंती और प्राचीनता अनूठी है। यह धरोहर अविस्मरणीय और अद्भुत हैं। इन्हें संजोने और संवारने के वादे और दावे तमाम हुए, प्रस्ताव भी बने, लेकिन काम कुछ नहीं हुआ है। ऐसे में पर्यटन के लिहाज से जिले की पहचान कैसे विकसित हो पाएगी। पेश है पौराणिक और पर्यटन के प्रमुख स्थलों पर आधारित रिपोर्ट...
शिवालिक की पहाड़ियों में प्राचीन सिद्धपीठ मां शाकंभरी देवी मंदिर है। यहां साल में दो बार मेला लगता है। इसे प्रांतीय कृत मेला घोषित की कवायद हुई है, मगर पर्यटन विभाग की तरफ से भेजे प्रस्ताव के मुताबिक जो कार्य होने थे, अब तक उनकी शुरुआत नहीं हो सकी है। इन कार्यों पर करीब 21.83 करोड़ रुपये का खर्च होने हैं।
-मां बाला सुंदरी मंदिर और देवी कुंड
कस्बा देवबंद में मां बाला सुंदरी का प्राचीन मंदिर है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। पर्यटन की दृष्टि से भी यह बेहद रमणीक स्थल है। मंदिर परिसर में ही देवी कुंड भी है। देवीकुंड और इस मंदिर को लेकर तमाम किवदंती भी जुड़ी हुई हैं।
- सिंधु कालीन सभ्यता का हुलास स्थल
गंगोह- तीतरो मार्ग पर गांव मनोहरा के पास हुलास टीला है, जो सिंधु कालीन सभ्यता से जुड़ा बताया जाता है। यहां वर्ष 1978-79 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने उत्खनन किया था। खोदाई में सिल बट्टे, मिट्टी के मनके और अन्य अवशेष निकले थे। प्राचीन मकानों की नींव, मिट्टी के फर्श और खंभे गाड़ने को बनाए गड्ढे भी मिले थे। माना गया था कि 3500 साल पूर्व सिंधु कालीन सभ्यता के दौरान यहां लोग निवास करते होंगे।
- खुजनावर का कुषाण कालीन टीला
छुटमलपुर क्षेत्र के गांव खुजनावर में कुषाण कालीन टीला है, जो करीब 2000 साल पुराना बताया जाता है। फिलहाल टीले पर ही गांव बसा हुआ है। गांव के ठीक पीछे चचाराव नदी बहती है। इसी तरह सरसावा में 1500 साल पुराना सिंधु कालीन टीला है। राज्य पुरातत्व विभाग ने इसके संरक्षण की बात कही, मगर यह टीला उपेक्षित है।
- कंपनी गार्डन
कंपनी बाग की स्थापना मुगल शासन काल में हुई। 1750 से पहले इंतिजामुद्दौला इसके संस्थापक माने जाते हैं, तब इसका नाम फरहत बख्श रखा गया था। बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कमान संभाली और इसे कंपनी गार्डन नाम दिया। यहां औषधीय, शोभनीय और अन्य उपयोगी पौधे लगाए। यहां डॉ. गोवान, डथी, रोयले, हार्टलैस और फ्यूचर जैसे महान वनस्पति शास्त्रियों ने शोध कार्य किया।
- रोहिला वंश का किला
देहरादून रोड पर रोहिला वंश का किला है, जिसमें वर्तमान में जिला कारागार संचालित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने इसे संरक्षित स्मारक भी घोषित किया हुआ है। मुख्य गेट के पास से ही किले की दीवारें दिखती हैं। जिला कारागार स्थानांतरित करने की प्रक्रिया चली, मगर सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है।
- फुलवारी आश्रम
बाबा लालदास के वाडा स्वतंत्रता संग्राम की यादें संजोए हुए हैं। क्योंकि सरदार भगत सिंह भी यहां आकर कई बार रुके थे। लालदास के वाडे में ही फुलवारी आश्रम है, जहां से 1930 में नमक सत्याग्रह की शुरुआत की गई थी। स्वतंत्रता संग्राम की अन्य भी यादें इससे जुड़ी हैं।
ये भी हैं खास
- नकुलेश्वर महादेव मंदिर नकुड़
- बरसी का महादेव मंदिर तीतरो
- वनखंडी महादेव मंदिर सरसावा
- जड़ौदा पांडा का तालाब
- जखवाला तालाब देवबंद
- पांडव तालाब रणखंडी
- लखनौती का किला
- गंगोह में हुमायूं द्वारा बनवाई मस्जिद