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ग्रामीण युवाओं में तेजी से बढ रहा मशरूम की खेती का क्रेज

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सहारनपुर। ग्रामीण युवाओं में तेजी से मशरूम की खेती का क्रेज बढ़ रहा है। इसके चलते जनपद में वर्ष 2009-10 में जहां करीब 30 से 35 क्विंटल मशरूम का उत्पादन हो रहा था, अब वह बढ़कर 400 टन तक पहुंच गया है। किसान वर्ष में मशरूम की तीन प्रकार की फसलें ली जाती हैं।
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जनपद में मशरूम की तीनों प्रजातियों की खेती होती है। इनमें से सफेद बटन मशरूम की खेती अक्तूबर से फरवरी, ढिगरी मशरूम की खेती मार्च महीने से लेकर मई के आखिर तक और मिल्की मशरूम की खेती जून से लेकर सितंबर तक होती है। बढ़िया भाव और अच्छे उत्पादन के कारण युवा किसानों का रुझान मशरूम की खेती की ओर बढ़ रहा है। इस समय करीब 250 किसान इसकी खेती कर रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉक्टर आईके कुशवाहा ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में किसानों का रुख मशरूम की खेती की ओर तेजी से बढ़ा है। तीनों प्रजातियों का भाव औसत 60 से 100 रुपये प्रति किलो तक रहता है। उन्होंने बताया कि यदि 100 किलो कंपोस्ट में मशरूम की खेती की जाए तो सफेद बटन का औसत उत्पादन 30 से 35 क्विंटल, मिल्की मशरूम का 45 से 55 क्विंटल और ढिंगरी मशरूम की औसत उपज 55 से 60 क्विंटल तक हो जाती है। जबकि औसत भाव 60 से 90 रुपये प्रति किलो तक रहता है। इसमें खास बात यह है कि जिस कंपोस्ट में मशरूम की खेती की जाती है बाद में उसे खेत में डाला जा सकता है, जिससे मृदा में कार्बेनिक मात्रा बढ़ती है। जनपद के किसान दिल्ली, देहरादून, चंडीगढ़, गुड़गांव, नोएडा तक सप्लाई करते हैं।
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मशरूम की खेती के फायदे
-स्वरोजगार का अच्छा साधन
-कम स्थान में हो सकता है उत्पादन
-लागत कम और मुनाफा अच्छा
-खेती के बाद कंपोस्ट का खाद के रूप में प्रयोग
- पौषक तत्वों से भरपूर फसल
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