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चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के बाद

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रावण की गिरफ्तारी के बाद भीम आर्मी के भविष्य पर निगाह(संशोधित)
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सहारनपुर। सहारनपुर हिंसा के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण की गिरफ्तारी के बाद सियासी गलियारे में हलचल मच गई है। एक पखवाड़े से कांग्रेस भीम आर्मी को अपने पाले में करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है। दिल्ली से लेकर लखनऊ तक वामपंथियों ने भी इस संगठन पर डोरे डाले हैं। यह और बात है कि बसपा ने इससे पूरी तरह से पल्ला झाड़ लिया है। राजनीतिक दलों से दूरी बनाने का दावा करने वाले इस संगठन का जनाधार और जनसमर्थन सियासी दलों जैसा होने के कारण प्रमुख सियासतदां अपनी रोटियां सेकने लगे हैं। भविष्य में क्या होगा यह वक्त बताएगा मगर, भीम आर्मी को लेकर राजनीतिक तापमान सामान्य नहीं है। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चंद्रशेखर उर्फ रावण की गिरफ्तारी के बाद भीम आर्मी की रहनुमाई सियासी हाथों में चली जाए। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि चंद्रशेेखर की गिरफ्तारी के बाद यह संगठन कमजोर पड़ जाएगा। कारण, संगठन के दूसरी पंक्ति के नेताओं में चंद्रशेखर जैसा जज्बा नहीं दिखाई देता। हिंसा के बाद चंद्रशेखर की फरारी के दौरान भीम आर्मी पूरी तरह बैकफुट पर रही। हालांकि चंद्रशेखर ही सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से अपने समर्थकों से रूबरू होता रहा था।
डेढ़ महीने पहले तक भीम आर्मी और उसके संस्थापक चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण को कोई नहीं जानता था। यह संगठन पिछले दो सालों से सक्रिय होकर दलितों के बीच उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा था। दलितों के बीच गहरी पैठ बना चुके इस संगठन का संस्थापक चंद्रशेखर अगड़ी जातियों खासकर राजपूतों के लिए रावण बनने लगा था। सोशल मीडिया को हथियार बनाकर भीम आर्मी ने गांव-गांव में संगठन खड़ा कर दिया। कानून की पढ़ाई करने वाला चंद्रशेखर बहुत ही सावधानी से भीम आर्मी को सोशल मीडिया से संचालित करता रहा। हिंसा के बाद फरारी के दौरान भी वह अपने वीडियो के जरिए समर्थकों तक अपनी बात पहुंचाता रहा। मगर बड़ा सवाल यह है कि चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के बाद भीम आर्मी का नेतृत्व कौन करेगा। हालांकि यह माना जा रहा था कि आजाद की गिरफ्तारी के बाद समर्थक आक्रामक होंगे, मगर ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है। उसके पीछे बड़ा कारण है कि संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर जिलाध्यक्ष तक पर पुलिस ने इनाम घोषित कर दिया है। जिसके चलते कांग्रेस अब भीम आर्मी की रहनुुमाई के नाम पर दलितों में सेंधमारी का रास्ता तलाश रही है। आपको बता दें कि जंतर-मंतर पर धरने के वक्त चंद्रशेखर ने अपनी गिरफ्तारी के बाद भाई कमल किशोर और राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रतन को आंदोलन की कमान चलाने की बात की थी। मगर, इनामी होने के कारण विनय रतन फरार है और भाई कमल किशोर कांग्रेस के पाले में खड़ा दिखाई दे रहा है। ऐसे में सियासी समर्थन मिलने से भीम आर्मी कमजोर भी पड़ सकती है। उधर, भाजपा भीम आर्मी को बसपा का हिस्सा बताकर घेराबंदी करना चाह रही और बसपा इससे पूरी तरह से पल्ला झाड़ रही है। हिंसा के बाद दलितों में भीम आर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती को भी यहां आना पड़ा था। ऐसे में चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण की गिरफ्तारी के बाद भीम आर्मी के भविष्य पर भी अटकलें लगाई जा रही हैं।
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भीम आर्मी ने कम समय में दलितों में पैंठ बनाई
अपनी आक्रामक छवि के चलते ही बहुत कम समय में भीम आर्मी ने दलितों के बीच अपनी जबरदस्त पैठ बना ली। करीब डेढ़ साल पहले घटकौली में बोर्ड को लेकर हुए विवाद में भी भीम आर्मी के लोग गांव में पहुंचे थे। इसके बाद दलित उत्पीड़न की शिकायत पर आक्रामकता के चलते यह संगठन मजबूत होता गया। शब्बीरपुर हिंसा के बाद भी संगठन के तेवर के कारण दलित समाज का युवा बड़ी संख्या में साथ खड़ा हुआ। फरारी के दौरान सोशल मीडिया पर चंद्रशेेखर आक्रामक तेवर अपनाए रखा। ऐसे में साफ है कि इस संगठन को चंद्रशेखर जैसा नेतृत्व ही चाहिए होगा।
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हिंसा के बाद चंद्रशेखर ने बनाई रावण की छवि
करीब डेढ़ साल पहले घडकौली गांव में एक बोर्ड से सुर्खियों में आए इस संगठन के संस्थापक चंद्रशेखर ने अगड़ी जातियों के खिलाफ नफरत को अपना हथियार बनाकर रावण नाम जोड़ा था। इसी गांव में बोर्ड को लेकर हुए बवाल के दौरान भी पुलिस को निशाना बनाया गया था। इसके बाद उसने अपने नाम के आगे आजाद उर्फ रावण जोड़ा था। नौ मई को सहारनपुर हिंसा के बाद उसने पुलिस, प्रशासन के साथ सरकार तक पर निशाना साथ कर अपनी रावण छवि को और मजबूत किया।
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