सहारनपुर। रोजगार और बाजार की भाषा नहीं बनने की वजह से हिंदी लगातार पिछड़ रही है। यह हमारा नहीं, बल्कि हिंदी के प्रोफेसर्स का कहना है। विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष में अमर उजाला ने महाविद्यालयों के हिंदी के प्रोफेसर्स से हिंदी की वर्तमान स्थिति और भविष्य पर बात की।
महाराज सिंह कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामविनय शर्मा ने कहा कि पिछले करीब दो दशक से भाषा और साहित्य के प्रति लोगों की रुचि घटी है। विद्यार्थी साहित्य को पढ़ना नहीं चाहता है। हिंदी के प्रचलन से बाहर होने की सबसे बड़ी वजह उन्होंने इसका रोजगार और बाजार की भाषा न बनना बताया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में युवा ऐसी शिक्षा चाहता है, जिसे पूरी करते ही रोजगार मिल जाए। मगर हिंदी में ऐसा कुछ नहीं है। जेवी जैन कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश चंद्रा ने हिंदी की दुर्दशा के लिए सरकार, शब्दावली आयोग और हिंदी भाषा परिषद आयोग को भी जिम्मेदार माना है। उन्होंने बताया कि सरकारी कार्यालयों की हिंदी में अरबी और फारसी के ऐसे शब्द समाहित हैं, जिनको आम हिंदी भाषी समझ नहीं पाता है। जेवी जैन कॉलेज के इतिहास विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सीमा चौधरी का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय जगत में हिंदी को व्याकरण और तकनीक की दृष्टि से एक समृद्ध भाषा के रूप में पहचान मिल रही है, मगर अपने ही देश में उच्च और मध्य वर्ग में हिंदी पिछड़ रही है।
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हिंदी को विषय के रूप में चुनना मजबूरी
महाविद्यालयों से मिली जानकारी के अनुसार हिंदी को विषय के रूप में पढ़ने वालों की संख्या में पिछले 20 साल में कोई कमी नहीं आई है। बीए में दाखिला लेने वाले 40 से 50 फीसदी छात्र हिंदी विषय को अपनी पहली पसंद के रूप में चुनते हैं। मगर बीए कंपलीट करने के बाद भी यदि उनसे उनके कोर्स की किताबें और लेखकों के बारे में पूछो तो उन्हें पूरा ज्ञान नहीं रहता है। वह केवल सरल विषय समझकर हिंदी अपने कोर्स में रखते हैं।
शिक्षकों की भारी कमी कैसे बढ़े हिंदी
महाविद्यालयों में हिंदी के शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार और सिस्टम हिंदी की बेहतरी के लिए क्या प्रयास कर रहा है। जेवी जैन कॉलेज की बात करें तो यहां हिंदी के शिक्षकों के छह पद स्वीकृत हैं, मगर कार्यरत मात्र एक शिक्षक हैं। महाराज सिंह कॉलेज में भी हिंदी विभाग में शिक्षकों के तीन पद स्वीकृत हैं, मगर एक ही शिक्षक कार्यरत हैं।