प्रतापगढ़ में क्षेत्राधिकारी जिया उल हक की हत्या ने उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। अखिलेश सरकार के महज 11 महीने के कार्यकाल में 11 सांप्रदायिक दंगे और अब एक आला पुलिस अधिकरी की मौत से समाजवादी पार्टी की अंदरूनी सियासत गर्मा गई है।
राजा भैया का इस्तीफा लेकर सरकार ने अपनी साख और सपा ने सियासी नुकसान से बचने की कोशिश की है लेकिन जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी की सक्रियता ने प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरणों के संकेत जरूर दे दिए हैं।
वहीं, राजा भैया के समर्थकों को भी इस मामले में सरकार का रुख रास नहीं आ रहा है। सोमवार को लखनऊ में विधानसभा से लेकर राजा के घर तक कई पार्टी के विधायक उनसे मिलते-जुलते रहे।
बताया जा रहा है कि रविवार को क्षेत्राधिकारी की हत्या में नाम आने के बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और राजा भैया के बीच फोन पर बातचीत हुई। बातचीत में विधानमंडल सत्र विपक्ष के हमले से सरकार को बचाने के तरीके पर विचार हुआ, उसी के तहत राजा भैया के इस्तीफे का फैसला हुआ।
राजा भैया ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सोमवार को विधानमंडल सत्र के पहले ही इस्तीफा सौंप दिया। अखिलेश ने इसे खुद जाकर राज्यपाल बीएल जोशी को सौंपा। बाद में वही हुआ, जिसकी उम्मीद थी। विपक्ष के हमले से बचने के लिए बचने के लिए सरकार ने इसे ढाल के रूप में इस्तेमाल किया।
बसपा, भाजपा और कांग्रेस ने सदन में मामला उठाया तो सरकार ने तर्क दिया कि मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है और अधिकारियों को तेजी से जांच व कार्रवाई के निर्देश दे दिए गए हैं।
अहमद बुखारी हुए सक्रिय
मौलाना अहमद बुखारी ने क्षेत्राधिकारी जिया उल हक की हत्या पर जिस तरह के तल्ख तेवर अपनाए, उसके चलते सपा के रणनीतिकारों को यह आशंका भी हो रही है कि यह मामला न केवल सरकार की छवि पर असर डालेगा बल्कि उन्हें राजनीतिक रूप से भी नुकसान पहुंचा सकता है। राजा भैया का इस्तीफा और हत्याकांड की सीबीआई जांच की घोषणा भी इसी सियासी दबाव का नतीजा हो सकती है।
राजपूत विधायक भी सक्रिय
भले विपक्षी दलों के हमलों का जवाब देने में राजा भैया का इस्तीफा सपा का सहारा बन जाए। लेकिन सपा के राजपूत विधायकों को सरकार की जल्दबाजी अच्छी नहीं लगी है। सोमवार को राजा दिन भर न अपने समर्थक विधायकों से घिरे रहे। गौरतलब है कि राजा निर्दलीय विधायक हैं लेकिन सपा की अंदरूनी राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ है। सपा राजा भैया के इस रसूख की अनदेखी भी नहीं कर पाएगी।
मुलायम के करीबी हैं राजा
अतीत पर नजर डालें तो वर्ष 2002 में मायावती सरकार से भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद राजा ने अपने कई समर्थकों को मुलायम के साथ खड़ा करके उनकी सरकार बनवाई थी। तभी से राजा व मुलायम एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी रहे हैं। सपा के भीतर आज भी राजा के कई समर्थक विधायक हैं। मुलायम व उनके बीच जिस तरह के प्रगाढ़ संबंध हैं, उनको देखते हुए भी सपा के राजा से नाता तोड़ने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है।