रियासत के नवाब के दो ताजों की लंदन में नीलामी की सूचना के बाद रियासत की विरासत के खुर्द-बुर्द होने पर भी सवाल उठने लगे हैं। रियासत के पास हीरे जवाहरात के साथ ही आयुध भंडार और शस्त्रागार के साथ असलहे भी थे। यही नहीं अपना पानी का जहाज भी था और रेलवे स्टेशन और ट्रेन भी थी।
रियासत के अंतिम नवाब रजा अली खां ने ब्रिटिश सरकार से लड़ाकू विमान (जिसका नाम रामपुर फाइटर रखा जाना था) खरीदने के लिए भी सौदा कर लिया था। लेकिन देश आजाद होने के बाद नवाबी प्रथा खत्म होने के कारण वह एयरक्राफ्ट नहीं खरीद सके। पानी का जहाज कहां है, रियासत के वारिसों को पता नहीं, ट्रेन स्टेशन पर खड़ी धूल फांक रही है।
देश की अन्य रियासतों के मुकाबले रामपुर की रियासत काफी पावरफुल थी। यहां की धरोहरों और इतिहास पर गौर किया जाए तो बहुत कुछ सामने आता है। नवाब रजा अली खां ने कोलकाता के बंदरगाह में 1000 पाउंड की कीमत से एक समुद्री जहाज एमएचआईएस रामपुर को प्राप्त किया और 11 मार्च 1944 को इस पोत एमएचआईएस रामपुर का उद्घाटन करके उसे ब्रिटिश नेवी बेड़े में शामिल किया था। नवाब ने उद्घाटन भाषण में ही कहा था कि रामपुर रियासत के जहाजरानी मामले में दिलचस्पी लेना हास्यास्पद जरूर लगता है, लेकिन हमारे लिए इसका विशेष महत्व है।
नवाब रजा अली खां ने हवाई जहाज निर्माण के लिए ब्रिटिश सरकार के मंत्री को 5000 पाउंड देकर अनुरोध किया था कि इस धनराशि से एक लड़ाकू विमान बनाया जाए, इस फाइटर जहाज का नाम रामपुर फाइटर रखा जाए। ब्रिटिश सरकार ने आभार स्वरूप इस जहाज के नमूने का एक टुकड़ा रामपुर नवाब को भेजा जोकि उनकी मेज पर सजा रहता था। लेकिन देश आजाद होने के बाद फाइटर प्लेन रामपुर नहीं आ सका था।