स्कूल प्रबंधकों की मनमानी और सरकारी तंत्र की सुस्ती ने गरीब बच्चों का मुफ्त में अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाई करने का सपना तोड़कर रख दिया है। रामपुर के तमाम स्कूल गरीब बच्चों को मुफ्त में एडमिशन देने से कतरा रहे हैं। कुछ तो बिल्कुल इससे किनारा किए हुए हैं। कुल मिलाकर सरकारी तंत्र गरीबों के बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दिला पाने में कामयाब नहीं हो पा रहा है।
शिक्षा के अधिकार कानून के तहत गरीब बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देने का प्रावधान है। इसके तहत सरकार की ओर से प्रावधान किया गया है कि गरीबों के बच्चे यदि किसी भी निजी स्कूल में अच्छी पढाई ग्रहण करना चाहते हैं और वह उनकी फीस से लेकर अन्य खर्चों को करने में असमर्थ हैं तो उनके लिए सरकार की ओर से व्यवस्था की गई है।इसके तहत सरकार की ओर से निजी स्कूलों में मुफत में एडमिशन से लेकर मुफ्त में यूनिफार्म देने की व्यवस्था की जाती है। बच्चे व उसके परिवार पर उसका कोई बोझ नहीं पड़ता है। कक्षा एक से बच्चे के एडमिशन की व्यवस्था होती है।
सरकार हर साल इस तरह के आदेशों का पालन कराने की व्यवस्था तो करती है,लेकिन सरकार के आदेश कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। इस दफा भी कुछ ऐसा ही है। इस दफा सात हजार गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त में एडमिशन दिलाने का प्रावधान किया गया है। इस टारगेट को पूरा कर पाना नामुमकिन लग रहा है क्योंकि प्रबंधकों की मनमानी के आगे सरकारी तंत्र बौना साबित हो रहा है। भले ही इसके लिए प्रशासन की ओर से पेंच कसे हों,लेकिन इसके लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बड़े मान्यता प्राप्त स्कूलों के प्रबंधक तो इस तरह के आदेशों को शुरू से ही हवा में उड़ाते रहे हैं। हालांकि वह खुलकर कुछ भी कहने से बचते जरूर हैं। फिलहाल गरीबों बच्चों की मुफ्त पढ़ाई का सपना अधूरा ही रहने वाला है।