नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन की विलायद के सिलसिले में महफिले मुसर्रत सजी। शायरों ने बारगाहे हुसैन में नजराना-ए- अकीदत पेश किया। उलमा ने जात-ए- हुसैन पर रोशनी डाली। इस्लाम की खातिर जो कुर्बानी दी उसका भी जिक्र किया।
नवासा-ए- रसूल हजरत इमाम हुसैन की विलादत के सिलसिले में किला इमामबाड़ा में महफिले मुसर्रत सजी। जलसे का आगाज तनवीर सहरी ने नात पाक से किया। शोहरा-ए- इकराम मुकर्रम नियाजी, समी नियाजी, अरीब नियाजी, सखावत हुसैन खां( निशात), शावेज जैदी, राशिद हिलाल और अमीर हाशिम ने बारगाहे इमाम हुसैन में नजराना-ए- अकीदत पेश किया। अजहर इनायती ने इस तरह कलाम पेश किया- एक-एक बूंद खून की सदियों से है अमि, तारीख जानती है के शब्बीर कौन है।
तनवीर सहरी ने यह कलाम पढ़ा- रब्बे अकबर की है तुझ पर मेहरबानी ऐ हुसैन, हश्र तक कोई न होगा तेरा सानी ऐ हुसैन। इमाम-ए- जमात शिया मस्जिद किला के मौलाना जमान बाकरी ने जात-ए- हुसैन पर तकरीर की और मोमेनीन को हजरत इमाम हुसैन और फजाइले इमाम हुसैन से मुस्तफीद फरमाया।
मौलाना ने कहा कि दो जात तमाम कायनात में ऐसी हैं, जिसका कोई सानी नहीं है। एक खुदा की जात खालिक होने की हैसियत से और दूसरे मौला हुसैन की जात मखलूक होने की हैसियत से। मौलाना ने कहा कि आपके बारे में रसूल-ए- अकरम का फरमान है कि- मेरा हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूं। मौलाना ने हजरत इमाम हुसैन की पैदाइश और इस्लाम की खातिर जो कुर्बानियां दीं उनका भी जिक्र किया। जलसे में अब्बास हैदर सहरी, तस्लीम मियां, ताहिर हुसैन, अली मोहम्मद आब्दी, फरहद खान, अजीम नकवी, अब्बास मेहंदी, शान जैदी, इरफान जैदी भी थे।