जिले को हरा भरा बनाने के दावे तो खूब किए जाते हैं, लेकिन यह महज कागजों तक सीमित है। पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाई जा रही हैं, जिससे हरियाली मिट रही है।
वन विभाग और पुलिस महकमे के अफसरों की लापरवाही हरे पेड़ों की कटान की वजह बन रही है। हालात ये हैं कि ठेकेदारों के आगे अफसर लाचार हैं।
आसानी से परमिट दे दिया जाता है। सेटिंग-गेटिंग करके एक परमिट पर कई पेड़ काट लिए जाते हैं। इसकी शिकायतें भी की जाती हैं, लेकिन कार्रवाई का नतीजा सिफर रहता है।
सरेनी, परशदेपुर, डीह, लालगंज, राही, सलोन, सतांव, बछरावां समेत अन्य क्षेत्रों में हर दिन कहीं न कहीं हरे पेड़ काटे देखे जा सकते हैं। सूचना के बावजूद कोई मौके पर नहीं पहुंचता।
ऐसे में जिले को हरा भरा बनाने का सपना हकीकत में नहीं बदल पा रहा है। इसको लेकर सख्ती बरतने की जरूरत है। वन विभाग से मिले आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2014-15 में 700 पेड़ों के कटान के लिए परमिट जारी किए गए थे।
वर्ष 2015-16 में पेड़ों की कटान के लिए 400 परमिट जारी किए गए हैं। अधिकतर लोग वन कर्मियों और पुलिस की मदद से बिना परमिट के हरे पेड़ कटवा लेते हैं।
अधिकारियों तक मामला पहुंच जाता है, तभी पेड़ कटान पर कार्रवाई हो पाती है। रिपोर्ट लिखने के बाद भी मामले में कोई कार्रवाई नहीं होती।
यही नहीं अधिकतर वन कर्मी पेड़ काटने की सूचना पर पहुंचकर जुर्माना देकर ठेकेदार को छोड़ देते हैं। खास बात ये है कि यूकेलिप्टस व पॉपलर पेड़ काटे जा सकते हैं।
आम, शीशम, पीपल, बरगद व इमली आदि के पेड़ बिना परमिट के काटने पर रोक है। बावजूद इसके मोटी कमाई की लालच में लकड़ी माफिया हरे पेड़ काट रहे हैं।
यही नहीं रोग ग्रस्त होने पर ही पेड़ों को परमिट मिलता है, लेकिन सेटिंग-गेटिंग में इसकी भी अनदेखी की जाती है। डीएफओ ओपी सिंह का कहना है कि बिना परमिट के किसी को भी पेड़ काटने की इजाजत नहीं दी जाती है।
जो शर्तें हैं, उसी के तहत परमिट भी दिए जाते हैं। बिना परमिट के पेड़ कटवाने वाले ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है।