गांव की सरकार में सदस्यों की उपेक्षा का परिणाम रहा कि जिले के 18 ब्लॉकों में 12 हजार 429 ग्राम पंचायत सदस्य के पदों में से लगभग दो हजार सीटों पर किसी ने नामांकन नहीं किया।
जबकि पांच हजार ग्राम पंचायत सदस्य निर्विरोध चुने गए हैं। ऐसे में गांव की सरकार में कल्याणकारी योजनाओं के संचालन की दशा के बारे में आसानी से अनुभव किया जा सकता है।
चुनाव के बाद अब सीटों के भरने के लिए उपचुनाव की नौबत बन गई है। गांव के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले ग्राम पंचायत सदस्य महज प्रधानों के स्टांप बनकर रह गए हैं।
गांव की सरकार में विकास कार्यों को लेकर बनने वाली समिति में निर्णायक साबित होने वाले ग्राम पंचायत सदस्य बदली राजनीतिक बयार में कोई खास असर नहीं छोड़ पा रहे हैं।
धन व बाहुबल की इस नई व्यवस्था में ग्राम पंचायत सदस्य पद से लोगों का मोह भी भंग होता जा रहा है। यही वजह है कि इस बार के पंचायत चुनाव में दो हजार पदों पर चुनाव नहीं हो सके हैं।
ऐसे में यहां पर सदस्य पद के लिए उप चुनाव होना पक्का माना जा रहा है। पांच हजार ग्राम पंचायत सदस्य निर्विरोध चुने गए हैं। पांच हजार 429 पदों पर ही चुनाव हुआ है।
सलोन, छतोह, राही, अमावां, बछरावां, हरचंदपुर समेत हर ब्लॉक में ग्राम पंचायत सदस्य पद खाली रह गए हैं। इसके पीछे माना जा रहा है कि इस पद पर कोई खास तवज्जों न मिलने से लोग अब चुनाव लड़ने से किनारा काट रहे हैं।
जिला पंचायत राज अधिकारी संजय यादव कहते हैं कि ग्राम पंचायत सदस्य पंचायतों के विकास के लिए अहम होता है।
गांव में होने वाले हर कार्य के लिए ग्राम पंचायत सदस्यों की सहमति भी जरूरी होती है।
गांव में नियोजन एंव विकास समिति, शिक्षा समिति, प्रशासनिक समिति, निर्माण कार्य समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति, जल प्रबंधन समिति में जीते ग्राम पंचायत सदस्यों की अहम भूमिका होती है।
प्रधान के अलावा ये भी बैठक करके विकास का एजेंडा तैयार करते हैं। डीपीआरओ कहना है कि इन समितियों में एक अनुसूचित जाति, एक पिछड़ा वर्ग, एक महिला सदस्य होना अनिवार्य होता है।