जिले में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। हालात यह हैं कि सांस लेने के लिए शुद्ध हवा नसीब नहीं हो रही है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से मार्च-2016 में वायु प्रदूषण की कराई गई जांच में सूक्ष्म ठोस कणों की मात्रा 150-200 माइक्रोग्राम/मीटर क्यूब पाई गई।
जबकि सूक्ष्म ठोस कणों की सीमा 100 माइक्रोग्राम/मीटर क्यूब निर्धारित है। इस बढ़ती सीमा से सबसे बड़ा खतरा वायु की शुद्धता को लेकर है। ग्रामीण इलाकों में बाग और बगीचे भी पर्यावरण को दूषित होने से बचा नहीं पा रहे हैं। बढ़ते वायु प्रदूषण की प्रमुख वजह 366 अवैध भट्ठे बन रहे हैं।
बावजूद इस पर रोक लगाने के लिए सार्थक कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक जिले में 366 ईंट भट्ठे हैं। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार का आदेश है कि बिना पर्यावरणीय स्वीकृति के कोई ईंट भट्ठा नहीं चलेगा।
पर्यावरण सुरक्षा के जुड़े सभी पहलुओं की भलीभांति पड़ताल के बाद डीएम की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय कमेटी भट्ठा संचालन की मंजूरी देगी। इतना ही नहीं इसके बाद भी संचालकों को पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति लेनी होगी।
लेकिन यहां इन आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। लगभग सभी भट्ठा मालिकों ने पथाई और ईंटों की पकाई का काम शुरू कर दिया है। न तो पर्यावरणीय स्वीकृति ली है और न ही बोर्ड की अनुमति। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से मार्च-2016 में वायु प्रदूषण की जांच कराई गई थी।
इसमें सूक्ष्म ठोस कणों की मात्रा 150-200 माइक्रोग्राम/मीटर क्यूब पाई गई थी, जबकि इसे 100 माइक्रोग्राम/मीटर क्यूब होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता वायु प्रदूषण गंभीर खतरे का संकेत है।
जिले में बिना पर्यावरणीय स्वीकृति के हो रहे ईंट भट्ठों के संचालन पर ईंट निर्माता संघ ने चुप्पी साध ली है। संघ का कोई भी पदाधिकारी कुछ भी बोलने से कतरा रहा है। जिलाध्यक्ष महेंद्र पाल सिंह और जिला महामंत्री विमल तलरेजा दोनों पदाधिकारियों से इस बारे में बात की गई, लेकिन दोनों पदाधिकारियों ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. बीरबल का कहना है कि धुआं हर तरह से मानव जीवन के लिए खतरनाक है। धुएं से सांस संबंधी बीमारियां होती है। इसे बोलचाल की भाषा में अस्थमा और चिकित्सीय शैली में सीओपीडी बोलते हैं।
शुद्ध हवा न मिलने स्वास की नलियों में सूजन आ जाती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन का अदान-प्रदान कम हो जाता है। सीने में जकड़न, भारीपन, खांसी आना और सांस फूलने लगती है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आरके सिंह का कहना है कि पर्यावरणीय स्वीकृति डीएम की अध्यक्षता वाली कमेटी को देनी है। इसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कोई भूमिका नहीं है। हालांकि अब तक किसी भी भट्ठा संचालक ने स्वीकृति नहीं ली है।
इस लिहाज से संचालित हो रहे भट्ठे पूरी तरह से अवैध हैं। अवैध भट्ठों की वजह से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। शुद्ध वायु में ठोस कणों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो गंभीर चिंता का विषय है।
एसडीएम सदर एसएन शुक्ला ने कहा कि ईंट भट्ठा संचालकों ने पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए अब तक 200 आवेदन आए हैं। कमेटी की अब तक कोई बैठक नहीं हुई है। जिला स्तर पर गठित कमेटी की बैठक में इन्हें स्वीकृति दी जाएगी। भट्ठों का हो रहा संचालन सही है या गलत, इस बारे में जिलाधिकारी ही बता पाएंगे।