फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'मरे के बाद बहुत उजियार कइ गइली बहादुर बिटिया'

Sat, 12 Jan 2013 08:36 AM IST
मनोज श्रीवास्तव/दामिनी के गांव से (बलिया)
विज्ञापन
विज्ञापन
दामिनी के घर के पड़ोस में परचून की छोटी-सी दुकान चलाने वाली फुलेसरी देवी कहती हैं, 'बिटिया जियते खाली माई-बाप के उम्मीद रहली, पर मरे के बाद सब गांव के उजियार कइ गइली। आज वोहिके चलते गंउवां में अस्पताल बन रहल बा। सड़किया पर माटी पड़े लागल बा। आज से पहिले कवनौ अधिकारी अउर नेता गांव में झांके ना आवत रहले, बाकि आज मेला लागल बा।’ इतना कहकर वह सुबकने लगती हैं।
विज्ञापन


केवल फुलेसरी ही नहीं गांव का बच्चा, बूढ़ा और जवान सब बिटिया के मुरीद लग रहे थे। संवेदना तो थी ही, कुछ गांव की तस्वीर बदलने की उम्मीद के चलते भी। कोई उसके जीवटता की तारीफ कर रहा था, कोई उसके जहीन होने की। किसी को उसका गांव में अस्पताल बनाने का जज्बा बार-बार याद आ रहा था। बिटिया साल या दो साल में एक या दो बार ही गांव आती थी। गांव वालों से उसका संपर्क थोड़ा ही था। पर अब स्मृतियों के सहारे उसे याद किया जा रहा था।

परिवार से करीबी रिश्ता रखने का दावा करने वाले राजीव राय ने बताया कि वह दो साल पहले गांव आई थी। उसी दरम्यान किसी ने गांव से अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया था। तभी उसने गांव में अस्पताल बनाने का संकल्प ले लिया था। एक अन्य पड़ोसी ने बताया कि वह ट्यूशन पढ़ाकर खुद की और अपने दो भाइयों की भी पढ़ाई का खर्च निकालती थी। जितने मुंह, उतनी बातें।
विज्ञापन


बिटिया के न रहने के बाद उसके होने का मतलब
गांव की तमाम औरतों को तो उसके न रहने के बाद उसके होने का मतलब समझ आ रहा था। उसके कारण गांव में अस्पताल बन रहा है, यह बात बिटिया को महान बना रही थी। दरअसल, इस उजाड़ से गांव में कोई बीमार होता है तो उसे 40-42 किमी दूर बलिया ले जाना पड़ता था या 12-14 किमी दूर बक्सर (बिहार)। 8-9 किमी दूर मुख्य सड़क तक आना तो किसी पहाड़ी पर चढ़ने से कम नहीं। स्वाभाविक है अब गांव में अस्पताल की कल्पना मात्र गांव वालों को किस हद तक आश्वस्त करती होगी, सहज समझा जा सकता है।

नारी अस्मिता की लड़ाई
बिटिया के लिए संवेदना केवल घर-गांव के देहरी तक ही सीमित नहीं। गांव में उमड़ी भीड़ में भी एक संभावना देख रहे पीयूसीएल के अखिलेश सिन्हा कह रहे थे कि जो हुआ वह निंदनीय ही नहीं, सभ्य समाज पर कलंक भी था। पर नारी अस्मिता की लड़ाई बहादुर बिटिया की सदैव ऋणी रहेगी। क्योंकि उसके बहाने देश महिला विमर्श पर ऐतिहासिक और सार्थक बहस से मुखातिब हुआ है। इसकी पहली उठान सबने जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर देख ली है।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शुक्रवार को बहादुर बिटिया के गांव पहुंचकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोलने की घोषणा की थी। बिटिया के माता-पिता को 20 लाख रुपये का ड्राफ्ट भी दिया था। साथ ही परिवार के एक या दो परिजनों को सरकारी नौकरी देने का भी आश्वासन दिया।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें