बूढ़ी आंखों ने अब इंतजार करना छोड़ दिया है। कोख से जन्म देने वालों को अम्मा याद तो करती हैं लेकिन, अपने संस्कारों को खुद ही कोसती भी हैं। पिता को जब पालने का वक्त आया तो बेटे ने उन्हें भी लताड़ कर घर की चौखट से बाहर कर दिया। जीवित माता-पिता ही बोझ लगने लगे।
लेकिन, पितृपक्ष में अनेक ऐसी संतान की ओर से अपने पुरखों की आत्मा की शांति के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है, जिन्होंने जीतेजी उनकी सेवा तक नहीं की।
चिलबिला महुली स्थित वृद्धाश्रम में 80 बुजुर्ग रह रहे हैं। इनमें 24 महिलाएं और 56 पुरुष हैं। बात करने पर बोले, घर पर भाई के साथ बेटा और बहू भी हैं। मगर जीते जी कोई पूछने वाला नहीं है। मरने के बाद लोग पितरों को पानी देने के साथ ही तर्पण भी करते हैं।
इनसेट-
कुंडा के देवर पट्टी निवासी शिव बाबू इंटर कॉलेज से अध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने अपने बेटे की शिक्षा और अच्छी जिंदगी के लिए ताउम्र कमर तोड़ मेहनत की। साथ ही बेटे की इच्छाएं पूरी करने के लिए अपने शौक तक के बारे में नहीं सोचा। लेकिन, शादी के बाद बेटेे ने ऐसी निगाह बदली कि जिंदगी दिनबदिन बदहाल होती गई।
शिव बाबू मिश्र ने सोचा था कि मरने के बाद बेटा मुखाग्नि देगा, श्राद्ध करके मोक्ष दिलवाएगा लेकिन, उसने बाप के मरने का इंतजार किए बगैर ही उन्हें तिरस्कृत कर दिया। खुद परदेस चला गया और बेसहारा शिव बाबू मिश्र, भटकते हुए वृद्धाश्रम पहुंच गए।
जीते जी डंडा मारे, मरने के बाद पिंडा पारे
अंतू के बैजलपुर निवासी शोभनाथ पाल के इकलौती संतान है। शादी के बाद उसके चार बच्चे हुए। इसके बाद मां की मौत हो गई तो वह पिता को भूल गया। परिवार सहित हरिद्वार में रहने लगा। इतना ही नहीं अब कभी घर पर बुलाता भी है तो कहता है,आश्रम से खाना खाकर आइएगा। बातचीत में रोते हुए शोभनाथ बोले, मानवता खत्म हो गई है। जीते जी बेटा डंडा मारता है, मरने के बाद भले ही दिखावे के लिए पिंडा पारे।
साइकिल की मरम्मत करते हुए जिसे पढ़ाया, वहीं आज अन्जान
पूर्वी सहोदरपुर निवासी रामबोध ने साइकिल स्टोर खोल रखे था। दिन-रात मेहनत करके दो बेटों और दो बेटियों को पढ़ाया। उनकी हर एक इच्छा पूरी की। लेकिन,जब सेवा की बारी आई तो बेटा और बेटी ही अन्जान बन गए। अब तो पहचानने से ही इनकार कर देते हैं। मजबूरन रामबोध वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं।
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श्राद्ध पक्ष में बनता है विशेष भोजन
आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों को पितृपक्ष के दौरान प्रतिदिन दोपहर के भोजन में पकवान परोसे जाने का सिलसिला शुरू हो गया है। खीर, पूड़ी, इमरती आदि की व्यवस्था रहेगी। समाजसेवी रोशन लाल कहते हैं, आश्रम में प्रतिदिन अलग-अलग पकवान तैयार करने की व्यवस्था की गई है। यहां रहने वाले लोग अपने पितरों को पानी भी देते हैं।
रामबोध।
रामबोध।