पीलीभीत। 69 वर्ष की उम्र किसी के लिए भी कम नहीं होती है। इस उम्र में अधिकतर महिलाएं घर तक सीमित हो जाती हैं मगर शहर की उर्मिला देवी नए जोश और जज्बे के साथ अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता की मुहिम छेड़े हुए हैं। वह अकेली महिला हैं जो अंध विश्वास के खिलाफ मुहिम चला रही हैं। उनकी मुहिम 2009 में शुरू हुई थी। अब इसे एक दशक से अधिक समय बीत गया है। कोशिशें अब भी जारी हैं। उर्मिला देवी की जागरूकता भरी मुहिम की शुरूआत बड़ी दिलचस्प है। इसकी कहानी अब उनकी ही जुबानी सुनिए।
मैं क्लुलड़िया में अपनी रिश्तेदारी में गई थी और वहां एक साधु वेशधारी आए थे। उन्होंने बिना माचिस के आग जलाई और हवन किया। इसे अपना चमत्कार बताया। हवन सामग्री जली और इससे तैयार राख की पुड़िया बनाकर महिलाओं को वह यह कहकर बेच गए थे कि जो इस राख को लगाएगा उसकी मनोकामना पूरी हो जाएगी। मैंने अपने पति लक्ष्मीकांत शर्मा को पूरी बात बताई। उस समय मेरे पति सनातन धर्म बांके बिहारी इंटर कॉलेज में विज्ञान के शिक्षक थे। अब सेवानिवृत हैं। पति ने बताया कि यह कोई चमत्कार नहीं होता।
सिर्फ एक रसायनिक क्रिया होती है। पोटेशियम परमैगनेट और ग्लिसरीन जब आपस में मिक्स होते हैं तो आग लगती है। आग लगने के लिए ज्वलशील पदार्थ, वायु और जलने लायक तापमान भर आवश्यक होता है। इसमें माचिस की जरूरत नहीं होती। साधु द्वारा इसे चमत्कार बताकर और महिलाओं से रुपये वसूल ले जाने की घटना से मुझे लगा कि गांव की महिलाओं को ठगी बचाया जाना जरूरी है। मैंने उसी दिन से ठान लिया कि महिलाओं को जागरूक करूंगी। ताकि महिलाएं झांसे में न आएं और अपनी संपत्ति बचाएं। क्योंकि मैंने यह भी देखा है कि कई बार महिलाओं को ज्वेलरी और रुपये दोगुने करने के नाम पर ठगा जाता है।
इस तरह की घटनाओं को रोकने का सिर्फ एक ही उपाय मुझे समझ में आया कि महिलाओं को जागरूक किया जाए। साथ ही कथित चमत्कारों की हकीकत को जनता के सामने प्रयोग करके दिखाया जाए। इसके लिए मैंने सबसे पहले अंध विश्वास और चमत्कार की व्याख्या नामक पुस्तक पढ़ी। पति से विज्ञान के उन प्रयोगों को सीखा जो अंधविश्वास का भंडाफोड़ करने के लिए महिलाओं के सामने करके दिखाना जरूरी था। साथ ही पुस्तक से चमत्कारों और अंधविश्वासों का भंडाफोड़ करने का तरीका समझा और समझाया भी।