पीलीभीत। यूएस, फ्रांस, डेनमार्क जैसे कई देशों की फिजाओं में कभी पीलीभीत की बांसुरी सुर भरा करती थी। पहले सालाना करीब 4-5 करोड़ का टर्नओवर था, अब यह उद्योग ठप होता जा रहा है। हालांकि उद्योग से जुड़े लोग आज भी अपनी पुस्तैनी बिरासत संभाले हुए हैं, पर उनकी माली हालत ठीक नहीं है।
आज उनकी बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि बांसुरी महोत्सव मनाया जा रहा है। हकीकत यह है कि जिले का बांसुरी उद्योग अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। उद्योग से जुड़े पचास फीसदी लोग दूरी बना चुके हैं। यह बात दीगर है कि डूबते बांसुरी उद्योग को नया आयाम देने के लिए जिलाधिकारी पुलकित खरे अपने स्तर से कुछ प्रयास जरूर किए हैं। एक जिला एक उत्पाद योजना में भी इसे शामिल किया गया है लेकिन अभी उतने प्रयास नहीं हो सके हैं, जितने प्रयासों की जरूरत है।
विदेशों से मिलता था ऑर्डर
मोहल्ला शेर मोहम्मद में बांसुरी का कारखाना चलाने वाले इकरार नबी बताते हैं कि करीब दस साल तक विदेशों से ऑर्डर मिला करते थे। यूएस, फ्रांस, डेनमार्क, कैलिफोर्निया से ज्यादा ऑर्डर मिलते थे। जिले से ट्रेन के माध्यम से माल समुद्री जहाज तक और फिर वहां से विदेशों में जाता था। कुछ सालों से पीलीभीत से ट्रेन से माल जाना बंद हो गया। उन्होंने बताया कि ट्रांसपोर्ट और एक्सपोर्ट की सुविधा मिले तो शायद जिले का बांसुरी उद्योग फिर से जिंदा हो सके। बांसुरी महोत्सव से थोड़ी उम्मीद बढ़ी है।
सोसाइटी भी हो गई बंद
बांसुरी उद्योग से जुड़ी समस्याओं और उद्योग से जुड़े लोगों को जागरूक करने के लिए जिले में हैंडीक्राफ्ट वर्कर एजुकेशन सोसाइटी बनाई थी। लेकिन उद्योग जैसे-जैसे धीमा पड़ा संगठन भी ठप हो गया। एक यह भी कारण है कि उद्योग से जुड़ी समस्याओं पर आवाज नहीं उठाई जाती।
एक जिला एक उत्पाद से नहीं मिला लाभ
योगी सरकार ने हर जिले में उद्योग को बढ़ावा देने को एक जिला एक उत्पाद योजना शुरू की, लेकिन इसका लाभ नहीं मिल पा रहा। उद्योग से जुड़े मोहम्मद आरिफ का कहना है कि बैंक से लोन की व्यवस्था थी, लेकिन अधिकतर को लोन नहीं मिला। जिनको मिला वह भी केवल पचास हजार या एक लाख, जबकि काम को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम तीन से पांच लाख की जरूरत होती है। उनका कहना है कि बांसुरी महोत्सव काफी नहीं बल्कि उद्योग को बढ़ाने के लिए जमीनी काम होने बेहद जरूरी हैं।
100-150 रुपये दिन की होती है कमाई
बांसुरी बनाने वाली तलत जहां का कहना है कि एक बांसुरी बनाने का डेढ़ रुपया मिलता है। सुबह नौ से शाम पांच बजे तक काम करने पर 100 से 150 रुपये का काम हो पाता है। उनका भाई बांसुरी बनाने और मेलों में बांसुरी बेचने का काम करता है। अगर कमाई बढ़े तो ठीक नहीं तो आमदनी के लिए दूसरे स्रोत खोजने पड़ेंगे। यही कहना बांसुरी बनाने वाले सलीम खां का है। उनकी पूरी जिंदगी बांसुरी बनाने में गुजर गई।
असम से आता है बांसुरी बनाने का बांस
बांसुरी बनाने के लिए असम से बांस मंगाया जाता है। जिले के कारखानों में बांसुरी तैयार की जाती है। मोहम्मद आरिफ और इकरार नबी का कहना है कि असम से ट्रक के माध्यम से कच्चा माल आता है। सवा लाख से ज्यादा किराया चला जाता है। अगर ट्रेन से माल आता तो सस्ता पड़ता है। लागत कम होती तो आमदनी बढ़ने की उम्मीद बढ़ती।
कोरोना और फिर जीएसटी ने उद्योग की कमर तोड़ी
कोरोना के कारण पिछले दो साल से बांसुरी की डिमांड में साठ फीसदी तक की कमी आ गई है। वहीं कच्चे माल पर जीएसटी लगने से भी उद्योग को झटका लगा है। पहले कच्चा माल टैक्स के दायरे में नहीं था। एक बांसुरी बनाने की लागत और ट्रांसपोर्ट पर करीब चार रुपये से ज्यादा खर्चा आ जाता है। जबकि बिक्री पांच रुपये तक होती है। जो कच्चा माल 22-23 रुपये सैकड़ा आता था आज वो 60-63 रुपये बैठता है।
पचास फीसदी छोड़ चुके हैं काम
बांसुरी उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि शहर में पहले छोटे-बड़े करीब बीस कारखाने हुआ करते थे। एक हजार से ज्यादा लोग इस उद्योग से जुड़े थे। जिन लोगों का पुस्तैनी काम है वही बचे हैं बाकी अधिकतर दूसरा काम करने लगे। करीब पचास फीसदी लोगों ने यह उद्योग छोड़ दिया। मोहम्मद आरिफ बताते हुए कि उनके कारखाने में पहले चालीस लोग काम करते थे। आज सिर्फ छह लोग बचे हैं।
चीन की प्लास्टिक बांसुरी का भी असर पड़ रहा
चीन में प्लास्टिक से बांसुरी तैयार हो रही है, जो सस्ती है। यह भी एक कारण है कि विदेशों में बांस से बनी बांसुरी की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।
बांसुरी महोत्सव से जागी उम्मीदें
शुक्रवार से शुरू हो रहे बांसुरी महोत्सव से उद्योग की उम्मीदें बढ़ी हैं। इसमें पंद्रह फिट की बजाने योग्य बांसुरी बनाई जाएगी। इससे बांसुरी को लेकर लोगों का ध्यान भी आकर्षित होगा। बांसुरी से जुड़े स्टाल भी लगाए जाएंगे।