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दहेज का दंश गृहस्थी पर भारी, महफूज नहीं हैं बेटियां

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पीलीभीत। समाज दहेज का विरोध भले ही कर रहा हो, मगर उसी के लिए हत्याओं में कमी नहीं आ रही है। दहेज विरोधी कानून लागू है। सामाजिक स्तर पर जागरूकता बढ़ी है पर दहेज का चलन कम नहीं हुआ। सख्त सजा का प्रावधान होने के बावजूद दहेज प्रताड़ना, दहेज के लिए हत्या और ससुराल में विवाहिताओं के द्वारा आत्महत्या करने के मामले बढ़े हैं। 2021 में अब तक 30 दहेज हत्या के मामले में सामने आए है। जबकि 2020 में सिर्फ 19 मामले थे।
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जिले में आधी आबादी पर हुए अत्याचार की बात करें तो बीते साल में 30 विवाहिताएं दहेज की बलि चढ़ गईं। दहेज के खिलाफ सामाजिक जागरूकता आई है। सख्त कानून की भी है। लेकिन दहेज हत्या की वारदातों में कमी नहीं हो पा रही है। आलम यह कि दहेज हत्या के मामले साल दर साल बढ़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह वे मामले हैं जिनमें परिवार वाले कानूनी कार्रवाई कराने के लिए थानों तक पहुंचे। कई मामलों को तो जिम्मेदारों ने पंचायत और सुलह समझौते के आधार पर दबा दिया। इसके अलावा उत्पीड़न की शिकायतें भी कम नहीं है।
किस वर्ष में कितनी हुई दहेज हत्याएं
वर्ष- हत्याएं
2021- 30
2020- 19
2019- 34
2018- 38
2017- 23
2016- 29
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लालच के आगे कानून का खौफ बौना
दहेज हत्या जैसे समाज विरोधी घृणित अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय दंड संहिता में संशोधन कर धारा 304 बी का प्रावधान किया गया। अगर इस धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया जाता है और महिला के विवाह के सात वर्ष हुए हैं तो महिला के असामान्य मृत होने पर पति और ससुराल वालों को ससुराल वालों को निर्दोष साबित होने के लिए यह बताना आवश्यक है कि महिला की मौत कैसे हुई।
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दहेज हत्या के मुकदमों की न्यायालय में पैरवी तक कराई जाती है। वहीं दंपती के बीच अनबन की शिकायतों पर पहले ये प्रयास रहता है कि सुलह समझौते के आधार पर गृहस्थी को टूटने से बचाया जा सके। परिवार परामर्श केंद्र में इसको लेकर सुनवाई होती है। हालांकि अधिकतर मामले न्यायालय के माध्यम से ही निपटते हैं।
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- सुनील दत्त, सीओ सिटी
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