पीलीभीत। उच्च न्यायालय ने प्रदेश के प्रमुख सचिव राजनीतिक पेंशन को आदेश दिया है कि वह शपथ पत्र के जरिये यह बताएं प्रदेश में कितने लोगों को लोकतंत्र सेनानी पेंशन मिल रही है। वह राजनीतिक बंदी थे या किसी अन्य मामले में जेल में बंद रहे।
यह आदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति पियूष अग्रवाल ने लोकतंत्र रक्षक सेनानी संगठन के अध्यक्ष अशोक शम्सा व अन्य की ओर से उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका पर दिया है। दरअसल, उच्च न्यायालय में वर्ष 2018 में जनहित याचिका दायर कर यह कहा गया था कि प्रदेश में पीलीभीत शहर व कई जिलों में अपात्रों को लोकतंत्र सेनानियों वाली पेंशन मिल रही है।
याचिका में पीलीभीत जिले में आपातकाल के दौरान 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक जेल में रहे 33 आपराधिक प्रवृति के लोगों को लोकतंत्र सेनानी सम्मान राशि दिए जाने का मामला उठाया गया था। हाईकोर्ट के आदेश पर तत्कालीन डीएम डॉ. अखिलेश मिश्रा ने एडीएम न्यायिक से जांच कराई थी। जांच के बाद छह लोगों को अपात्र पाते हुए उनकी पेंशन पर रोक लगा दी गई थी। नौ लोगों की जांच के मामले में प्रशासन की रिपोर्ट स्पष्ट नहीं थी। पीआईएल में इसी मामले की सुनवाई की गई। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति पियूष अग्रवाल के समक्ष याचिका की सुनवाई के दौरान यह कहा गया कि आपातकाल के दौरान जेल में बंद रहे लोगों को जो सम्मान राशि मिल रही है। उनमें से कुछ लोग धोखाधड़ी से यह राशि ले रहे हैं। इस पर जांच होनी चाहिए। इस पर उच्च न्यायालय ने प्रमुख सचिव राजनीतिक पेंशन को आदेश दिया है कि वह अपना शपथ पत्र दाखिल करें कि कितने लोगों को मासिक पेंशन मिल रही है। शपथ में यह भी उल्लेख करना होगा कि जिनको पेंशन मिल रही है। वह वे राजनीतिक बंदी थे या फिर अन्य मामलों में जेल गए थे। उच्च न्यायालय में इस याचिका की अगली सुनवाई 18 अप्रैल 2022 को होगी।