सपा और कांग्रेस का हनीमून खत्म होने का असर अब केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के दोस्ताना रिश्तों पर भी दिखने लगा है। दरअसल, केंद्र के साथ बेहतर संबंध बनाने की पैरोकारी करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दिल्ली से दूरी बनाते दिख रहे हैं।
अब इसे संयोग कहें या फिर राजनीतिक दांवपेंच का नमूना, अखिलेश ने केंद्र की ओर से बुलाई गई बैठकों से दूरी बनाना शुरू कर दिया है। अखिलेश सोमवार को गृह मंत्रालय की ओर से बुलाई गई प्रशासनिक सुधार आयोग की बैठक में नहीं आए।
इसके अलावा वह 7 अप्रैल को हाईकोर्ट के जजों और मुख्यमंत्रियों की बैठक में भी नहीं आए थे। उन्होंने अपने कैबिनेट मंत्रियों को प्रतिनिधि बनाकर भेजा। इस कदम से अखिलेश ने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की परंपरा को जारी रखना शुरू कर दिया है।
मार्च, 2012 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर अपनी पूर्ववती माया सरकार को नसीहत दी थी कि राज्य सरकारों को केंद्र के साथ राजनीतिक टकराव किनारे कर सूबे के विकास के लिए तालमेल बैठाकर रखना पड़ेगा।
मायावती अपने पांच साल के कार्यकाल में केंद्र सरकार की ओर से बुलाई बैठकों से लगभग गायब ही रही थीं। मगर अखिलेश अब अपनी बात से पीछे हटते दिख रहे हैं।
सपा सूत्रों की माने तो आगामी लोकसभा चुनाव में सपा केंद्र सरकार पर राज्य के साथ भेदभाव बरतने के आरोप को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। लिहाजा, अखिलेश ने भी केंद्र से दूरी बनानी शुरू कर दी है।
सपा का मानना है कि राहुल गांधी प्रदेश सरकार पर हमला करने लगे हैं, ऐसे में मुख्यमंत्री ने जवाबी रणनीति की योजना बना ली है। उधर, गृह मंत्रालय की ओर से सोमवार को बुलाई बैठक में मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर शिरकत कर रहे चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन ने कहा कि मुख्यमंत्री दूसरे कामों में व्यस्त हैं। इसलिए वह आ नहीं सके।