जिले में नीरव मोदी की कमी नहीं है। बैंकों से पैसा लेकर अपने आपको दिवालिया घोषित कर चुके उद्यमी मौज काट रहे हैं। इनके पास कोठी, कार सबकुछ है। जिले में बैंकों का सबसे ज्यादा पैसा लोहा फैक्ट्री मालिकों ने मारा है, लेकिन पैसा हजम करने वालों की शान शौकत में कोई कमी नहीं है।
जिले में बैंकों का एनपीए लगभग 1000 करोड़ है। इनमें अकेले पीएनबी का 550 करोड़ है। बीते पांच सालों में जिले में लोहा और स्टील की 66 फैक्ट्री बंद हुई हैं। अधिकतम फैक्ट्री बैंकों से लिए गए ऋण के दम पर ही चल रही थी। फर्नेस की फैक्ट्रियों के बंद हो जाने से बैंकों का पैसा डूब गया है।
यहां सबसे बड़ी बात यह है कि जिन लोगों के पास बैंकों के करोड़ों है, उनकी शान शौकत में कोई कमी नहीं आई है। ये लोग आज भी लग्जरी लाइफ जी रहे हैं। बड़ी कोठियां, नई-नई गाड़ियां इनके शौक है। बैंक अधिकारी इनकी कोठियों के बाहर गांधीगीरी तो कर रहे हैं, लेकिन ऋण चुकाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे हैं।
पीएनबी की बकायेदार को गुलाब का फूल भेंटकर ऋण वसूलने की नीति सफल नहीं हो पाई है। मुंबई में नीरव मोदी और कोठारी का मामला सामने आने के बाद यहां भी बैंक अधिकारी बड़े बकायेदारों की कुंडली खंगालने में लगे हैं।
अब देखना यह है कि पैसा लेकर हजम कर लेने वाले उद्यमियों पर बैंक क्या कार्रवाई करता है। हालांकि उद्यमी बैंक खातों को एनपीए किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। उद्यमी कहते हैं कि 90 दिन तक खाते में लेनदेन नहीं करने पर खाते को एनपीए में डाल दिया जाता है। बैंकों को इस प्रक्रिया में थोड़ा बदलाव लाना होगा। उद्यमियों पर जितना ऋण है, अधिकतम के पास उससे ज्यादा की प्रॉपर्टी है।