बयान दिया कि रात करीब ढाई बजे पुलिसकर्मी चार महिलाओं को उनकी बस में बेठाकर गए थे। महिलाओं के कपड़े अस्त-व्यस्त थे और वह रो रहीं थी। इस दौरान चश्मदीद ने कठघरे में खड़े आरोपियों को नहीं पहचाना। अगली सुनवाई 24 मई को होगी। आरोपी देवेंद्र कुमार, कृपाल सिंह, तनकीम अहमद, रणपाल सिंह, वीरेंद्र कुमार, नरेश त्यागी, राकेश मिश्रा, बृजेश कुमार और सुमेर सिंह अदालत में हाजिर हुए। दस आरोपियों ने हाजिरी माफी प्रार्थना पत्र दिया।
यह था मामला
एक अक्तूबर, 1994 की रात अलग राज्य की मांग के लिए देहरादून से बसों में सवार होकर आंदोलनकारी दिल्ली के लिए निकले थे। इनमें महिला आंदोलनकारी भी शामिल थीं। पुलिसकर्मियों ने रात करीब एक बजे रामपुर तिराहा पर बस रुकवा ली गई। आरोप है कि महिला आंदोलनकारियों के साथ छेड़खानी और दुष्कर्म किया। उत्तराखंड संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 25 जनवरी 1995 को सीबीआई ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए थे, जिसकी सुनवाई चल रही है।
मेरे हाथ में डंडा मारा, आज तक नहीं गया दर्द
पीड़िता ने अदालत में कहा कि पुलिसकर्मियों ने उसके हाथ में भी डंडा मारा था। वह बस से नहीं उतरी और बस में अपनी साथी महिला के साथ बैठी रही। हाथ में आज भी दर्द है। मेरा पर्स गायब हो गया था, जिसमें सात सौ रुपये थे। पुलिसकर्मी कई बार हमारी बस में चढ़े, इधर से उधर तलाशी लेते रहे। मुझे शक है कि पुलिसकर्मियों ने ही मेरे रुपये गायब किए हैं।
चश्मदीद ने अदालत में जो कहा
- हमारी बस में 28 महिला और दो पुरुष सवार थे।
- बस में बैठी कुछ महिलाएं ढाबे पर खाना खाने गई थीं।
- पुलिसकर्मी बसों को शीशे तोड़ते हुए आ रहे थे।
- पुलिसकर्मी गाली दे रहे थे, मुझे आज भी शर्म आ रही है।