खतौली। आचार्य अनुज शास्त्री ने कहा कि जीवित माता-पिता ही पितर होते हैं। ईश्वर, जीव और प्रकृति यह तीनों अनादि हैं, इनमें ईश्वर सत्य चित और आनंद स्वरूप है। जब आत्मा केवल सत्य और चेतन है, प्रकृति सत्य है इसी कारण आत्मा आनंद प्राप्ति के लिए परमात्मा का सानिध्य पाने में प्रयासरत रहती है। जिसमें शारीरिक और आत्मिक बल होता है, वही सामाजिक उन्नति भी कर सकता है।
आर्य समाज शिवपुरी के वेद प्रचार समारोह के पहले दिन देहरादून से आए अनुज शास्त्री ने कहा कि महाभारत में द्रोपदी चीर हरण के समय दादा भीष्म वहां थे और नीचे को ओर गर्दन किए बैठे रहे, क्योंकि उनमें शारीरिक बल तो था, लेकिन आत्मिक बल नहीं था। जबकि वहीं पर विदुर भी बैठे थे उनमें शारीरिक बल नहीं था, आत्मिक बल था। उन्होंने खड़े होकर घोषणा कर दी कि यह कृत्य पाप है और सभा छोड़कर के बाहर चले गए।
उन दिनों एक ऐसे पुरुष भी थे, जिनमें शारीरिक और आत्मिक बल के साथ सामाजिक बल भी था। योगेश्वर श्रीकृष्ण महाराज परंतु उस समय वह वहां नहीं थे। पंडित ऋषिपाल पथिक और आर्य भजन उपदेशिका सुकृति ने भजन सुनाए। पंडित रामदेव शास्त्री और राजेश आर्य ने हवन कराया। जिसमें दीपक आर्य यजमान रहे। इस अवसर पर रामानंद आर्य, जगदीश सिंह, सुरेश फौजी, रण सिंह आर्य, चरण सिंह आर्य, दिनेश आर्य, भगवान सिंह, सुनील आर्य, अमरीश कौशिक, सुनील वर्मा, महाराज सिंह, ज्ञानेंद्र आर्य, मास्टर जयपाल सिंह, रामशरण सिंह आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन जिला प्रधान सत्येंद्र आर्य ने किया।