खतौली क्षेत्र में छह साल की मासूम से दुष्कर्म के दोषी दिव्यांग चाचा को शेष प्राकृत जीवन के लिए आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/विशेष न्यायालय (पॉक्सो अधिनियम) संख्या-1 की पीठासीन अधिकारी मंजुला भालोटिया ने फैसले में लिखा कि यह कृत्य मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला है। मासूम के साथ दुष्कर्म केवल एक शरीर के विरुद्ध अपराध नहीं है, बल्कि यह मानवता और समाज की आत्मा पर किया गया प्रहार है। दिव्यांगता या पारिवारिक स्थिति दोषी की क्षमा का आधार नहीं बन सकती।
वारदात 10 नवंबर 2024 को हुई। सुबह 10 बजे मासूम को पड़ोसी रिश्ते का चाचा हाथ पकड़कर अपने घेर में ले गया और दुष्कर्म किया। मजदूर माता-पिता जानकारी मिलने पर घर लौटे और खतौली थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और विवेचना के बाद आरोपपत्र दाखिल किया। विशेष पॉक्सो न्यायालय में केस की सुनवाई हुई। अभियोजन पक्ष ने सात और बचाव पक्ष ने दो गवाह पेश किए।
बुधवार को दिव्यांग आरोपी पर दोष सिद्ध हुआ। अदालत ने लिखा कि दंड का निर्धारण करते समय अपराध की प्रकृति, पृष्ठभूमि और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। इसके बाद दोषी को बीएनएस 2023 की धारा 65(2) और पॉक्सो अधिनियम 2012 की धारा 6 में दोषी को शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए सश्रम आजीवन कारावास की सजा और 50 हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया गया।
धारा 137(2) के अंतर्गत दोषी को सात वर्ष के सश्रम कारावास और 10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। दो सजाएं एक साथ चलेंगी। जुर्माने की संपूर्ण धनराशि 60 हजार रुपये पीड़िता को बतौर प्रतिकर दिए जाएंगे।
शोर मचाया...कोई नहीं आया बचाने
अदालत में छह साल की मासूम की गवाही सजा का आधार बनी। प्रतिपरीक्षा में पीड़िता ने कहा कि चाचा उसे घेर में ले गया था। शोर मचाने पर थप्पड़ मारे। कोई बचाने नहीं आया। वह खुद ही अपने घर पहुंची थी। बचाव पक्ष ने कहा कि माता-पिता के सिखाने पर बयान दिया गया लेकिन अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।
इसलिए सजा...बच्चों की ओर न उठे आंख
अभियोजन की ओर से पैरवी करने वाले एडीजीसी फौजदारी विनय अरोरा और विक्रांत राठी ने बताया कि अदालत में बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दोषी दिव्यांग है, उस पर माता-पिता की जिम्मेदारी है। जमीन के विवाद का हवाला भी दिया। इस पर अदालत ने कहा कि इस तरह अपराधों में निवारक सिद्धांत का लागू होना नितांत आवश्यक है, ताकि कोई अन्य व्यक्ति ऐसे अबोध बच्चों की ओर आंख उठाने का दुस्साहस न कर सके।
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