वहीं, बसपा ने पिछला चुनाव गठबंधन के साथ लड़ा था, लेकिन इस बार अलग रहने के संकेत दे दिए हैं। ऐसे में गठबंधन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसकी वजह यह भी है कि बसपा ने जिन लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारे, उसकी स्थिति मजबूत नजर आई है। मुजफ्फरनगर लोकसभा में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार बन गए हैं।
बसपा ने इन प्रत्याशियों को उतारा
चुनाव प्रत्याशी
1996 ताराचंद शास्त्री
1998 ताराचंद शास्त्री
1999 राजपाल सैनी
2004 सूरत सिंह वर्मा
2009 कादिर राना
2014 कादिर राना
2019 गठबंधन
बसपा से चमके और साथ छोड़ गए
सियासी समीकरण की लिहाज से सबसे मजबूत बसपा से चुनाव लड़ने वाले नेता धीरे-धीरे पार्टी को छोड़ गए। पूर्व सांसद कादिर राना, पूर्व सांसद राजपाल सैनी, रालोद के वर्तमान विधायक अनिल कुमार, पूर्व मंत्री योगराज सिंह, पूर्व विधायक नूर सलीम राना, पूर्व विधायक नवाजिश आलम, पूर्व विधायक मौलाना जमील, पूर्व मंत्री यशवंत सिंह, प्रदीप सैनी, सूरत सिंह वर्मा ने बसपा का दामन छोड़ दिया।
विधानसभा में सब पर भारी रही बसपा
पिछले दो दशक के विधानसभा चुनाव देखें तो बसपा अन्य राजनीतिक दलों पर भारी पड़ती नजर आई है। 2002 में मोरना से राजपाल सैनी और चरथावल से उमा किरण विधायक चुनी गई थी। हालांकि, बाद में उमा किरण सपा में शामिल हो गई। 2007 में खतौली से योगराज सिंह, जानसठ से डॉ. यशवंत सिंह, चरथावल से अनिल कुमार चुनाव जीते। 2009 के लोकसभा चुनाव में कादिर राना सांसद चुने गए थे। 2012 के चुनाव में मीरापुर से मौलाना जमील, चरथावल से नूरसलीम राना और पुरकाजी से अनिल कुमार चुनाव जीत थे। 2017 और 2022 में बसपा सारी सीटें हार गईं।
हम मजबूती से चुनाव लड़ेंगे : रवि
बसपा जिलाध्यक्ष सतीश रवि का कहना है कि बसपा मजबूती से चुनाव लड़ेगी। गठबंधन का निर्णय नेतृत्व का होगा। पूरी ताकत से प्रत्याशी को चुनाव लड़ाया जाएगा।
सपा सूबे में मुख्य विपक्षी दल : जिया
सपा जिलाध्यक्ष जिया चौधरी का कहना है कि सपा सूबे में मुख्य विपक्षी दल है। गठबंधन का लाभ बसपा को सबसे ज्यादा होगा। सभी दलों को साथ मिलकर ही चुनाव लड़ना चाहिए।