इंटर की परीक्षा में कम अंक आने से आहत हुई छात्रा ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली। छात्रा को प्रथम श्रेणी आने की उम्मीद थी, मगर उसकी द्वितीय श्रेणी आई। छात्रा की मौत से परिजनों में कोहराम मचा है। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
नई मंडी कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला शिवनगर निवासी संतरपाल की बेटी नैना (18) गांधी कालोनी स्थित एसडी गर्ल्स इंटर कॉलेज की इंटर की छात्रा थी। रविवार को इंटरमीडिएट का परीक्षाफल आया। वह घर से साइबर कैफे पर रिजल्ट देखने गई थी। वह 12 वीं की परीक्षा में द्वितीय श्रेणी में पास हुई।
उसके 271 अंक आए। अपने परीक्षाफल से वह संतुष्ट नहीं थी। वह दुपहर को घर आई और कम अंक आने की बात कर हर उसने खुद पर नाराजगी जताई। बताया गया है कि कुछ देर बाद वह सहेली के पास जाने की बात कह कर घर से निकली। दोपहर करीब तीन बजे सरवट फाटक के पास दिल्ली-अंबाला पैसेंजर ट्रेन के आगे कूद कर उसने आत्महत्या कर ली।
मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई। सूचना पर सिविल लाइन पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और शव को कब्जे में लिया। बाद में उसकी पहचान नैना के रूप में हुई। पुलिस ने शव का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। उसकी मौत से परिजनों में कोहराम मचा है।
परिजन मामा के यहां गए थे
मुजफ्फरनगर। शिवनगर निवासी श्रमिक संतरपाल की बेटी नैना पढ़ाई में होशियार थी। दो भाइयों की वह इकलौती बहन थी। उसने इंटर की परीक्षा दी थी। उसे प्रथम श्रेणी आने की उम्मीद थी, मगर उसकी द्वितीय श्रेणी आई। परीक्षाफल जानने के बाद वह साइबर कैफे से घर पहुंची।
उस समय उसकी मां और पिता तथा बड़ा भाई हडौली माजरा गांव में मामा के यहां होने वाले शादी समारोह में शामिल होने गए थे। रिजल्ट देख कर वह काफी परेशान थी। घर पर अन्य परिजन मौजूद थे। वह सहेली के पास जाने की बात कह कर घर से निकली थी, तब किसी को पता नहीं था कि वह जान देने जा रही है। बेटी की मौत की सूचना मिलने पर परिजन हडौली माजरा गांव से देर शाम घर लौट आए। घर पर सांत्वना देने वालों का तांता लगा है। बेटी की मौत से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
दबाव में अवसाद में आ जाते हैं बच्चे
मुजफ्फरनगर। प्रमुख समाजशास्त्री एवं डीएवी कॉलेज के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ कलम सिंह का कहना है कि माता-पिता बच्चों से कभी-कभी ज्यादा ही उम्मीदें कर लेते हैं। ऐसे में परिणाम आने पर बच्चा अपने आपको अकेला समझने लगता है। उसे लगता है कि सब उससे नाराज है और वह अवसाद में चला जाता है।
ऐसी स्थिति में वह नासमझी में गलत कदम उठा लेता है। अब स्कूलों में काउंसलर तक तैनात किये जाने लगे हैं। हालांकि बच्चे के सबसे अच्छे काउंसलर उसके अभिभावक हैं। अभिभावक सही प्रकार से समझा दें तो बच्चा अवसाद से बाहर आ जाता है।