मुजफ्फरनगर। कसेरवा की हलीमा के पास शब्द नहीं हैं 'अमर उजाला' का शुक्रिया अदा करने के लिए। एक माह पहले तक हलीमा मुश्किलों के भंवर में थी। पिता के इंतकाल ने परिवार पर मुफलिसी का अंधेरा ला दिया। फीस चुकाने के लिए पैसे नहीं थे। किसी ने मदद भी नहीं की। पढ़ाई छूटने वाली थी, ऐसे में हलीमा ने 'अमर उजाला' से अपना दर्द बयां किया। इसके बाद उसकी जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया।
हलीमा बचपन से होनहार है। उसके जन्म से ही हाथ नहीं हैं, लेकिन उसके हौसलों ने उसे कभी यह कमी महसूस नहीं होने दी। हलीमा ने पैरों से ही लिखना शुरू किया। गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ1ने के लिए गई तो हाथ नहीं होने पर उसे एडमिशन देने से इंकार कर दिया गया। हलीमा की उम्मीदें बिखर गईं, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद हलीमा ने घर पर ही पढ़ाई का अभ्यास किया।
बाद में 2007 में उसका एडमिशन कस्तूरबा विद्यालय में हुआ। इसके बाद राजकीय इंटर कालेज से इंटरमीडिएट बाद की। बेटी की पढ़ाई की जिद पर पिता मोमीन ने उसका दाखिला श्रीराम कालेज में बीएएलएलबी में करा दिया। इसी बीच उसके पिता मोमीन का इंतकाल हो गया। मोमीन परिवार के अकेले कमाने वाले शख्स थे। पिता की असमय मौत ने हलीमा के सपनों पर पानी फेर दिया। स्कूल की फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे।
हलीमा ने आसपड़ोस में पैसे जुटाने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही। इसी दौरान हलीमा ने इस संवाददाता से संपर्क किया। 'अमर उजाला' उसकी आवाज बन गया। प्रमुखता से खबर छपने के बाद लोगों का ध्यान हलीमा की ओर गया। श्रीराम कालेज प्रबंधन ने हलीमा की फीस माफी का ऐलान कर दिया। इसके बाद तमाम जनप्रतिनिधि मदद लेकर हलीमा के दरवाजे पर पहुंचे।
प्रशासन ने भी हलीमा के घर पहुंचकर हलीमा की विकलांग पेंशन और उसकी मां शाहिदा की विधवा पेंशन की औपचारिकताएं पूरी कीं। जिला पंचायत सदस्य पति अथर चौधरी और एमएलसी आशु मलिक ने यह मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाया। सीएम ने शुक्रवार को हलीमा को लखनऊ बुलाया।
हलीमा से लिखवाकर देखा गया। उन्होंने हलीमा को एक लाख रुपये नगद और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। हलीमा के पास शब्द नहीं हैं शुक्रिया अदा करने के लिए। भर्राए गले से कहती है कि अगर वह साथ नहीं देते तो उसे यह मुकाम हासिल नहीं होता।
गांव में ही मिल सकती है नौकरी
मुजफ्फरनगर। मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद शिक्षा अधिकारियों ने हलीमा से संपर्क करना शुरू कर दिया है। हलीमा को गांव के ही कस्तूरबा विद्यालय में नौकरी देने की जानकारी दी गई है। हलीमा को शहर आने-जाने में दिक्कत को देखते हुए उसे गांव के कस्तूरबा विद्यालय में ही नौकरी देने का फैसला हुआ है।