मुजफ्फरनगर। चुनाव की रणभेरी बज गई है और सियासी गलियों में हलचल है। टिकट पाने और बचाने की जुगत लगाई जा रही है। छह सीटों पर काबिज भाजपा के सामने चुनाव में इस बार बचाने की चुनौती होगी, जबकि विपक्षी दल सीटें हासिल करने के लिए ताकत झोकेंगे। बदले माहौल में इस बार सपा-रालोद गठबंधन का भी भविष्य तय होगा।
दिल्ली की सीमाओं पर 13 महीने चले किसान आंदोलन से पश्चिमी यूपी के समीकरण बदले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानून वापस लेकर भले ही किसानों की नाराजगी दूर करने का प्रयास किया हो, लेकिन फैसले का इम्तिहान चुनाव में होगा। 2017 में चली लहर से हर सीट पर कमल खिल गया था।
भाजपा के सामने इस बार सबसे बड़ी चुनौती पुराने प्रदर्शन को बरकरार रखने की होगी। पिछली बार सपा और रालोद अलग-अलग चुनाव लड़े थे, लेकिन इस बार गठबंधन में दोनों दल भाजपा के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं। एक महीने की उथल-पुथल में साफ हो जाएगा कि भाजपा कितनी सीटें बचा पाती है और बाकी दल क्या हासिल करते हैं।
बालियान का सबसे बड़ा इम्तिहान
केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान ने पिछले सात साल में भाजपा को मजबूती दिलाने का काम किया है, लेकिन इस बार विपरीत हालात में सबसे बड़े इम्तिहान से गुजरना होगा। कृषि कानून को लेकर हुए विरोध और इसके बाद बने हालात में भाजपा के प्रदर्शन की जिम्मेदारी उनके ऊपर रहेगी।
चरथावल और मीरापुर में होंगे नए चेहरे
चरथावल से चुनाव जीतकर मंत्री बने विजय कश्यप का कोरोना संक्रमण के कारण निधन हो गया था। इस बार यहां भाजपा नए चेहरे को मैदान में उतारेगी। मीरापुर से चुनाव जीते अवतार भड़ाना ने भाजपा छोड़ दी थी, उनकी जगह भी नए और क्षेत्र के चेहरे पर ही दांव चलने की तैयारी है।
14 जनवरी को घोषित होंगे गठबंधन के प्रत्याशी
रालोद ने 10 जनवरी को वर्चुअल तरीके से बैठक बुलाई है। पहले चरण में चुनाव वाले जिलों के जिलाध्यक्ष और क्षेत्रीय अध्यक्ष इसमें शामिल रहेंगे। 14 जनवरी को पहले चरण के प्रत्याशियों का एलान किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
अजित सिंह की हार और निधन से भावनाओं की लहर
विधानसभा चुनाव में इस बार भावनाओं का ज्वार भी उठेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में चौधरी अजित सिंह की हार और इसके बाद कोरोना में उनके निधन से भावनाओं का लहर भी उठेगी।