मां के गुनाह से अंजान बचपन सलाखों के पीछे बीत रहा है। कानून की बंदिशों में बंधे 12 मासूमों के लिए महिला जेल ही घर-आंगन है। दो बच्चे ऐसे है, जिनकी मां को हत्या जैसे संगीन जुर्म में सजा मिली है, जबकि दस बच्चे विचाराधीन महिला बंदियों के है। दुनियादारी से बेखबर बच्चों की पूरी दिनचर्या बंदी मां के साथ ही बीतती है। चिंता का पहलू यह है कि इन बच्चों को अभी प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है।
जिला कारागार की महिला जेल में मुजफ्फरनगर और शामली जनपद की फिलहाल 84 महिलाएं बंदी है, जिनमें 18 को कोर्ट से सजा मुकर्रर हो चुकी है। कई पति और दहेज हत्या के जुर्म में कारावास भुगत रही है। इनके अलावा 66 महिला बंदियों के मामले न्यायालय में विचाराधीन है।
जेल की चाहरदीवारी में 12 मासूम ऐसे है, जिन्होंने कोई जुर्म नहीं किया। बस, कसूर इतना है कि उनकी मां कानून की कसूरवार है। ये बच्चे वहीं खेलते है, वहीं हंसते है और मां के संग बैरक में ही सोते है। बंदी मां की रोजमर्रा की जिंदगी को देख कर पलते-बढ़ते बच्चों को नहीं मालूम है कि मां ने क्या गुनाह किया है?
विडंबना यह है कि वो बच्चे अपने परिवार से उपेक्षित हो गए है, जिनकी मां पर पति के कत्ल का आरोप है। उन वारिसों से खुद उनके मिलने नहीं आते। दादा-दादी या चाचा-चाची कौन है, उन्हें नहीं मालूम। जेल की चाहरदीवारी ही घर-आंगन बन गई है। अन्य महिला बंदी से मिल रहा स्नेह उन्हें अपनापन देता है।
छह साल तक की उम्र के इन मासूमों में आठ बालक और चार बालिकाएं है। बाहर की दुनिया कैसी है, वो अंजान है। जो शिक्षित महिला बंदी है, वो अपने बच्चे को पढ़ाई का अक्षर ज्ञान करा रही है। हालांकि कोई भी बच्चा स्कूल नहीं जा रहा है।
जेल में बचपन बिताने को मजबूर बच्चों को परवरिश की मुफीद जगह नहीं मिलने का उन पर मानसिक और शारीरिक असर भी पड़ना स्वाभाविक है। आकांक्षा समिति की अध्यक्षा एवं डीएम की पत्नी सुधा शर्मा और सदस्या बीना शर्मा ने गत सप्ताह जेल पहुंच कर महिला बंदियों का हाल जाना था। साथ ही जेल अफसरों के समक्ष मासूमों की पढ़ाई को एडमिशन की बात रखी थी।
महिला बंदियों और बच्चों की स्थिति पर केंद्र ने मांगी रिपोर्ट
नेशनल क्राइम रिकाड्र्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार देश में यूपी की जेलों में महिला बंदियों की संख्या सबसे ज्यादा है। हाल ही में केंद्रीय महिला बाल विकास मंत्रालय ने प्रदेश में महिला बंदियों और उनके बच्चों की स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है। स्वास्थ्य, पोषण, पुनर्वास, स्वच्छता आदि बिंदुओं पर केंद्र सरकार ने रिपोर्ट ली है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अलावा जिले में आकांक्षा समिति समय-समय पर महिला जेल में जागरूकता कार्यक्रम चलाती है।
जेल प्रशासन कराएगा बच्चों की पढ़ाई
मुजफ्फरनगर। जेल अधीक्षक एके सक्सेना ने बताया कि जेल मै2न्यूअल के मुताबिक जेल में महिला बंदियों और बच्चों की देखभाल हो रही है। टीकाकरण, पोलियो ड्राप्स, क्रेच सुविधा, पुष्टाहार और स्वास्थ्य परीक्षण के जरिए बच्चों की सुरक्षा का पूरा ध्यान है।
फिलहाल महिला जेल में बंदियों के साथ 12 बच्चे है। नियमानुसार छह साल की आयु तक के बच्चे ही मां के साथ रह सकते है। बाद में परिजनों की सुपुर्दी या बाल सुधार गृह में भेजा जाता है। बच्चों की प्राथमिक शिक्षा दिलाने की जेल प्रशासन ने कार्य योजना बनाई है।