मुजफ्फरनगर। नई मंडी थाना क्षेत्र के शहर से सटे गांव कूकड़ा में किराए के गोदाम में चल रही फैक्टरी में नमक में बदरपुर और रंग मिलाकर नकली खाद (डीएपी) बनाया जा रहा था। इस मिश्रण से बनाए गए डीएपी के प्रत्येक बोरे पर आरोपी चार सौ से एक हजार रुपये तक का मोटा मुनाफा कमाते थे।
शहर से सटे गांव कूकड़ा में बचनसिंह कॉलोनी निवासी रमेश पाल और बड़गांव के मिर्जापुर निवासी धर्मेंद्र ने करीब डेढ़ माह पूर्व एक गोदाम किराए पर लिया था। यहां आरोपियों ने एक मिक्सचर मशीन लगाते हुए क्षेत्र के कई लोगों को मजदूरी पर रखा। इंस्पेक्टर ने बताया कि आरोपी मोटा नमक और बदरपुर (भवन निर्माण सामग्री) को थोक में मंगाने के बाद इसे मिक्सचर मशीन में डालकर मिक्स करते थे, जिसमें थोड़ा सा रंग भी मिला दिया जाता था। इसके बाद इस मिश्रण में कुछ केमिकल डालकर सहकारी क्षेत्र की प्रतिष्ठित कंपनी इफ्को व आईपीएल के खाली बोरों में भरकर पैक कर दिया जाता था। बोरे पैक करने के लिए मजदूरों को तीन रुपये प्रति बोरा दिया जाता था। इस पूरी प्रक्रिया में एक बोरे की लागत करीब दो से ढाई सौ रुपये आती थी, जिसे 650 रुपये में सहारनपुर मंडल के कई क्षेत्रों में सप्लाई किया जाता था। किसानों को यह डीएपी पूरे मूल्य 1250 रुपये में बेचा जाता था। इस प्रकार एक बोरे पर चार सौ रुपये से एक हजार रुपये तक का मोटा मुनाफा कमाया जाता था।
डीएपी का होता है सबसे अधिक इस्तेमाल
मुजफ्फरनगर। खेती में डाई यानी अमोनियम फास्फेट (डीएपी) का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है। इसमें करीब 18 प्रतिशत नाइट्रोजन और 46 प्रतिशत तक फास्फेट (फास्फोरस) होता है। इसके दाम यूं तो करीब 1,800 रुपये प्रति बोरी तक होते हैं, लेकिन सरकार द्वारा इस पर संबंधित कंपनियों को सब्सिडी भी दी जाती है। सब्सिडी के बाद किसानों को यह करीब 1250 रुपये प्रति बोरी के प्रभावी मूल्य पर मिलती है। डीएपी के अत्यधिक इस्तेमाल के चलते सरकार इसे सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराती है।
किसानों को नकली-असली का नहीं होने दे रहे थे जानकारी
मुजफ्फरनगर। खेती में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले उर्वरक डीएपी को लेकर किसानों के बीच मारामारी रहती है, लेकिन दिलचस्प यह है कि अधिकांश किसानों को इसके नकली-असली होने का पता तक नहीं चल पाता। दरअसल, खेती में में डीएपी का अधिक इस्तेमाल होने के कारण नकली डीएपी भी फसल में डाल दिया जाए तो उसके असर होने या न होने का किसानों को पता तक नहीं लग पाता। नकली डीएपी बनाने वाले आरोपी इसी बात का फायदा उठाते हुए धड़ल्ले से नमक व बदरपुर से इसे तैयार कर सप्लाई कर मोटा मुनाफा कमा रहे थे।
दो साल पहले भी पकड़ा गया था आरोपी रमेश पाल
मुजफ्फरनगर। शहर से सटे गांव कूकड़ा में नकली खाद बनाने का आरोपी बचनसिंह कॉलोनी निवासी रमेश पाल इससे पहले भी गांव वहलना के पास नकली खाद बनाने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। वर्ष 2019 में उसे कृषि विभाग के अफसरों ने पुलिस के सहयोग से पकड़ा था, जिसके बाद उसे जेल भेज दिया गया था। अब फिर से आरोपी को इसी धंधे में पकड़ा गया है, जिसके खिलाफ कॉपीराइट एक्ट के साथ ही धोखाधड़ी में भी रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। वहीं, फरार आरोपी धर्मेंद्र की तलाश की जा रही है।