पहली बार मुजफ्फरनगर जिले में हुई थी चकबंदी
मुजफ्फरनगर। चकबंदी प्रक्रिया को लेकर सीएम की नाराजगी से यह विभाग एक बार फिर चर्चाओं में है। विवादों का केंद्र बनी चकबंदी की शुरुआत मुजफ्फरनगर जनपद से ही हुई थी। वर्ष 1954 में कैराना तहसील (वर्तमान में शामली जिला) में चकबंदी को ट्रायल के आधार पर शुरू किया गया। इसके बाद पूरे प्रदेश में इसे लागू कर दिया गया। जिले की स्थिति पर गौर करें तो यहां भी चकबंदी अफसरों के न्यायालयों में लगभग 1500 से ज्यादा मुकदमे लंबित चल रहे हैं। किसानों को तारीख पर तारीख मिल रही है।
चकबंदी प्रक्रिया को लेकर आए दिन विवाद होते रहते हैं। अच्छी जमीन की कीमत कम लगाने, उड़ान चक बनाने तथा प्रभावशाली लोगों के पक्ष में होकर छोटे किसानों का नुकसान करने को लेकर चकबंदी विभाग के अधिकारियों पर आरोप लगते रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सूबे के चकबंदी अफसरों की बैठक लेकर प्रक्रिया को आसान बनाने तथा किसानों का उत्पीड़न रोकने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने किसानों को स्वैच्छिक चकबंदी के लिए तैयार करने को कहा है। जिले की स्थिति पर गौर करें तो यहां भी चकबंदी अफसरों के न्यायालयों में लगभग 1500 से ज्यादा मुकदमे लंबित चल रहे हैं। किसानों को तारीख पर तारीख मिल रही है, लेकिन न्याय नहीं मिल पा रहा। वैसे तो प्रदेश में चकबंदी की शुरुआत 1958 में हुई थी, लेकिन मुजफ्फरनगर ऐसा जिला है, जहां पर इसे ट्रायल के आधार पर शुरू किया गया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर जनपद की कैराना तहसील जो अब शामली जिले में है, में 1954 में चकबंदी प्रक्रिया शुरू हुई। इसके साथ ही पूर्वांचल में सुल्तानपुर जिले की मुसाफिर खाना तहसील में भी इस प्रक्रिया का ट्रायल हुआ था। ट्रायल पूरा होने के बाद ही प्रदेश में इसे लागू किया गया।
जिले में हो चुकी बड़ी कार्रवाई
करीब पांच साल पहले तत्कालीन डीएम कौशलराज शर्मा के समय में डीसीसी समेत नौ चकबंदी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी। इसके अतिरिक्त बघरा ब्लॉक के गांव अटाली में भी चकबंदी प्रक्रिया में जमीन की पैमाइश में खेल करने पर चकबंदी विभाग के दो एसीओ, एक कानूनगो व तीन लेखपालों के खिलाफ भी सितंबर 2019 में कार्रवाई हुई है।
चकबंदी में बड़े स्तर पर सुधार की जरूरत
भारतीय किसान यूनियन के मंडल महासचिव राजू अहलावत का कहना है कि चकबंदी किसानों के उत्पीड़ऩ का माध्यम बन गई है। जिस गांव में चकबंदी होती है वह दशकों पीछे चला जाता है। वह कहते हैं कि चकबंदी प्रक्रिया में व्याप्त स्तर पर सुधार की आवश्यकता है।