कई पीढ़िय़ों से कसबे में दर्जी का काम करने वाले कौशिक बताते है कि किसान राजनीति के शिखर पर मुकाम पाने के बावजूद भी चौधरी टिकैत ने अपनी वेशभूषा, आहार और व्यवहार नहीं बदला। उनकी उम्र तब 15 की थी, जब वह पहली बार कपड़े सिलवाने आए थे। खोखली बांह का कंठीदार कुर्ता और टोपी सिलवाते थे। 14 मीटर की खादी की दोहर उनके कंधे पर रहती थी। देश-विदेश में कहीं भी किसान आंदोलनों में गए, मगर किसान की सादगी की पहचान बनाए रखी।
कसबे के इंदर रहतू की दुकान से वह खादी खरीदते थे। भाकियू का रणसिंघा जब भी बजता, वह भी किसानों के कारवां में शामिल हो जाते थे। मित्रता का लगाव इतना बना कि किसान आंदोलन में जब भी जाते, मैं पहले से बैग में एक नया कुर्ता लेकर चलता था। हैदराबाद में प्रदर्शन के दौरान चौधरी टिकैत का कुर्ता फट गया। बोले, पंडित जी अब क्या होगा? मैने बैग से कुर्ता निकाला और पहनवा दिया। जिंदगी की अंतिम सांस तक उनका साथ बना रहा।
वर्ष 2011 में अस्वस्थ हो गए और बिना कुर्ते के खाट पर आंगन में बैठे थे। कुर्ता पहनने पर गर्मी की दिक्कत बताई, तो मैने तुरंत उनके लिए खादी के दो बनियान बनाए। उन्हें पहन कर चौधरी टिकैत ने आराम महसूस किया। उनके जाने के बाद हमने भी कुर्ता सिलना छोड़ दिया है। उम्र भी बढ़ गई है। अब तो बस भाकियू की टोपी और झंडे बनाने का काम कर लेता हूं। पत्नी बलवंती देवी की मदद से दर्जी के काम में मशगूल रहता हूं। बेटे कपड़े सिलाई का काम नहीं करते, वे सब नौकरीपेशा है।
सिलाई के कभी नहीं लिए पैसे
दर्जी जगबीर कौशिक ने चौधरी टिकैत से कभी कुर्ता सिलने के पैसे नहीं लिए। कहते हैं कि उनका जीवन किसानों की सेवा में बीता, ऐसे में हमें भी फख्र होता है। उनकी बदौलत सिसौली किसानों की राजधानी बनी। सादा देहाती खाना उन्हें पसंद था। बिना भेदभाव के सभी से भाईचारा रखते थे। मक्का की रोटी, साग, कढ़ी और शक्कर-चावल उनके पसंदीदा भोजन था।