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दिव्या की जीत पर पुरबालियान में जश्न का माहौल, झूमे ग्रामीण

Wed, 22 Aug 2018 12:38 AM IST
अमर उजाला/ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
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ढोल की थाप पर झूमते पुरबालियान के ग्रामीण। - फोटो : अमर उजाला
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जकार्ता एशियाड में दिव्या काकरान के कांस्य पदक जीतने पर पुरबालियान में खुशियों के संग ढोल बजे और मिठाईयां बांटी गई। पौत्री की कामयाबी से गदगद दादा राजेंद्र पहलवान और दादी प्रेमवती को ग्रामीणों ने दिल से बधाई दी। तीन पीढ़ियों से सेन परिवार कुश्ती से जुड़ा है। ग्रामीणों ने कहा कि दिव्या के पदक से रेसलिंग में बेटियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। दिव्या की सफलता पूरे जिले को नाज है। परिवार के लोगों ने कहा कि दिव्या काकरान शुरू से काफी हिम्मती थी।  
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पुरबालियान में मंगलवार सुबह से ही सबकी निगाहें दिव्या की कुश्ती पर टिकी थी। क्वार्टर फाइनल में पराजय के बाद कुछ देर के लिए मायूसी छा गई, लेकिन कांस्य पदक की उम्मीदें जगी रही। किस्मत ने दिव्या का साथ दिया और उसे कांस्य पदक के लिए आखिरी कुश्ती लड़ने का मौका मिला। उसने दमदार तरीके से प्रदर्शन किया और ब्रांज मेडल हासिल कर लिया। गांव की गलियों में जीत के साथ ही शोर मच गया। पहलवान राजेंद्र सेन के घर ग्रामीण पहुंच गए।

ढोल की थाम पर युवा झूमे और मिठाईयां बंटने लगी। दादा राजेंद्र ने कहा कि पौत्री दिव्या ने गांव का नाम रोशन कर दिया। दादी प्रेमवती, चाची शर्मिष्ठा की खुशी का ठिकाना नहीं था। चाचा मोहनवीर ने कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक के बाद जकार्ता एशियाड में भी बेटी के पदक जीतने की आशा थी। चचेरे भाई निशांत और बहन निशा ने मिठाई बांटी। मंसूरपुर गन्ना परिषद के चेयरमैन रुपेंद्र, डायरेक्टर बिजेंद्र बालियान, भाजपा नेता नंद किशोर पांचाल, विक्रम मुखिया, बिजेंद्र आर्य, शेखर कुमार आदि ने घर पहुंच कर परिजनों को बधाई दी। 
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टोक्यो ओलंपिक से पहले देनी पड़ेगी धार
अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में बड़ेे दमखम वाली दिव्या काकरान गोल्ड से चूक रही है। पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में और अब जकार्ता एशियाड में वह क्वार्टर फाइनल में प्रतिद्वंद्वी पहलवानों पर पार नहीं पा सकी। बस एक ही खूबी है जो उसे लगातार दूसरी बार कांस्य पदक जीता ले गई। दिव्या ने जकार्ता में चीनी ताइपे रेसलर चेन वेनलिंग को 10-0 के अंतर से सिर्फ 89 सेकंड में चित कर दिया।

अपनी जीत को बड़े पदक में तब्दील नहीं कर पा रही दिव्या काकरान को टोक्यो ओलंपिक से पहले अपने दांवपेंच को नई धार देनी पड़ेगी। उसके पिता सूरजवीर पहलवान भी यह मानते हैं। 13 अप्रैल 2018 को गोल्ड कोस्ट के राष्ट्रमंडल खेलों में 68 किलोग्राम वर्ग में दिव्या को आखिरी बाजी में ब्रांज मेडल मिला था। उसने बांग्लादेश की पहलवान सुल्ताना को 36 सेकंड में पटखनी दे दी थी। 10-0 से उसने यह बाजी जीती थी।

रेपचेज बाउट में तकनीकी क्षमता के दम पर दिव्या ने यह पदक पाया था। ऐसा ही जकार्ता एशियाड में हुआ। हालांकि वह बड़े इरादे से इंडोनेशिया आई थी। गोल्ड कोस्ट की तरह फिर स्वर्ण पदक से चूक गई। भाग्य ने साथ दिया, जिस मंगोलियाई पहलवान शाहखु तुमेंत सेल्सेग ने उसे 1-11 से हराकर उसकी राह रोक दी थी, वो फाइनल में पहुंच गई। इसी वजह से दिव्या को रेपचेज बाउट में कांस्य पदक की बाजी का अवसर मिल गया।

दिव्या ने एक बार फिर तकनीकी योग्यता के दम पर 10-0 की बढ़त ले ली और अंत में वही पदक जीताने का आधार बनी। जूनियर एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में भी उसे रजत पदक पर ही संतोष करना पड़ा था। कुल मिला कर बड़ा मौका गंवाने के बाद दिव्या पूरे दमखम से वापसी करती है। तीन बड़ी स्पर्धाओं में ऐसा ही नजर आया है।

भारतीय कुश्ती संघ और लखनऊ साईं सेंटर के अनुबंध में देश की शीर्ष महिला रेसलरों को लखनऊ में गहनता से प्रशिक्षण दिया गया, जिसका लाभ विनेश फोगाट और दिव्या काकरान को मिला। पिता सूरजवीर पहलवान कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में मुकाबले का दिव्या का पहला अनुभव है। जीत को स्वर्ण पदक में बदलने के लिए उसे अपनी योग्यता और बढ़ानी होगी। कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियाड में ब्रांज मेडल की सफलता उसे उम्दा प्रदर्शन का हौसला देगी। एक दिन वह देश के लिए गोल्ड भी जीतेगी।

मां संयोगिता ने की सिलाई, पिता ने बेचे लंगोट
मुजफ्फरनगर। अंतरराष्ट्रीय रेसलर दिव्या काकरान को बुलंदियों के मुकाम तक लाने में उसके पिता और मां ने जिंदगी की दुश्वारियों से लंबी जद्दोजहद की है। कोई प्रायोजक नहीं, पिता की नौकरी नहीं और पुरबालियान में मात्र कुछ बीधा पुश्तैनी जमीन, ऐसे हालात में दिव्या कुश्ती की शान बनी है। मां संयोगिता बताती है कि घर खर्च को पहलवानों के कपड़े सिलने प्रारंभ किए। बेटी अखाड़े में कुश्ती लड़ती और बाहर पिता लंगोट बेचते।

आज भी वह सिलाई कर रही है। दिव्या को कई बार कुश्ती लड़ने को दूध की दिक्कतें आई, तो वह ग्लूकोज पीकर अखाड़े में उतरी। पिता सूरजवीर के मुताबिक कदम-कदम पर परिवार ने बेटी को हिम्मत दी। लखनऊ साईं सेंटर प्रशिक्षण भाई देव सेन बाहर कमरा लेकर किराये पर रहा।

ट्रेनिंग के बाद खाली समय में वह मेट पर दिव्या के साथ कुश्ती की जोर आजमाइश करता था। छोटा भाई दीपक भी अखाड़े में भविष्य तलाशने लगा है। जकार्ता एशियाई खेलों में बेटी के पदक जीतने को ईश्वर से प्रार्थना की थी, जो भगवान ने सुन ली। चाचा मोहनवीर और चाची शर्मिष्ठा ने बताया कि बचपन में ही दिव्या को कुश्ती आकर्षित करने लगी थी। उसने मिट्टी में खूब पसीना बहाया है।  
 
शोहरत का श्रेय पिता को देती है दिव्या
मुजफ्फरनगर। दिव्या जितनी बड़ी पहलवान बन गई है, उसकी बातें और जीवन शैली उमंगों से भरी है। फेस बुक पर अपडेट रहती है। देश के नामचीन खिलाड़ियों से उसकी मित्रता बढ़ने लगी है। जकार्ता में महिला कुश्ती में देश को पहली बार स्वर्ण पदक दिलाने वाली हरियाणा की विनेश फोगाट से लखनऊ ट्रेनिंग में उसकी खूब छनी। बैडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल, द्रोणाचार्य अवार्डी सतपाल पहलवान, जुगमेंदर पहलवान आदि के साथ उसकी फोटो फेस बुक पर चमक रही है।

भारत रत्न सचिन तेंदुलकर उसके पसंदीदा क्रिकेटर है। दिव्या का अपने पिता सूरजवीर सिंह से स्नेह उसकी बातों से झलकता है। दिव्या कहती है कि मेरी दुनिया में जितनी शोहरत है, मेरे पापा की बदौलत है। जिंदगी में त्याग, संघर्ष और परिश्रम से ही मुकाम मिलते हैं। भटकने के लिए बहुत विकल्प है, लेकिन जीवन में संकल्प एक ही काफी होता है। बताते चले कि दिव्या सीसीएसयू मेरठ कैंपस में बीपीईएस तृतीय वर्ष की छात्रा है। 
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