अपनों की मौत का गम और सिस्टम की दुत्कार
मुजफ्फरनगर। रेल हादसे में परिवार के सदस्य की मौत के बाद शोक में डूबे परिजनों को मोर्चरी पर अव्यवस्था के चलते आंसू बहाने पड़े। पोस्टमार्टम के बाद जब शव बाहर निकालकर रख दिया, तो परिवार के लोग एंबुलेंस को ताकते रह गए। जटमुझेड़ा के लोग तो अपना शव ट्रैक्टर-ट्रॉली से ले गए। बाकी को खुद के पैसों से एंबुलेंस का इंतजाम करना पड़ा। पीड़ित परिजनों के सवालों का पीएम हाउस पर मौजूद एसडीएम और पुलिस अफसरों के पास कोई जवाब नहीं था।
हादसे के बाद रेल यात्री अपने घायल और लापता साथियों की तलाश में रातभर अस्पतालों में भटकते रहे। जो सही सलामत मिले, उन्होंने खुद को भाग्यशाली समझा। मौत के आगोश में समा गए परिजनों में शोक दिखाई दिया। रिश्तेदारों का शव लेने के लिए उत्कल एक्सप्रेस के अन्य यात्री मोर्चरी पहुंचे तो सरकार की बदइंतजामी ने आंसू निकाल दिए। मोर्चरी पर 11 बजे पोस्टमार्टम शुरू हो पाए। जटमुझेड़ा के प्रमोद का शव पोस्टमार्टम हाउस से बाहर आया तो प्रशासन के पास शव भेजने के लिए एंबुलेंस नहीं थी। ग्रामीण ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर आए और शव उसमें रखकर ले गए। इसके बाद शहर के रामपुरी निवासी विनीत मित्तल और इंदिरा कॉलोनी निवासी रामपाल शर्मा के परिजनों ने जब हालात देखे तो उन्होंने खुद की एंबुलेंस का इंतजाम किया। ग्वालियर के ब्रिजेश पांडेय का शव लेने के लिए आए विकास राव ने एसडीएम शीतल प्रसाद से एंबुलेंस मांगी तो वह व्यवस्था करने की बात कहते रहे। विकास राव को खुद पैसे खर्च कर ग्वालियर तक की एंबुलेंस करनी पड़ी। मौत का गम और पैसों की तंगी भी नजर आई। परिजन शव को गांव पहुंचाने के बाद एंबुलेंस चालकों को पेमेंट करने का वादा किया गया। सहारनपुर की करिश्मा की डेडबॉडी लेने आए नवाब अहमद को भी घर तक जाने के लिए एंबुलेंस का खुद ही खर्च वहन करना पड़ा। एडीजी रेलवे बीके मौर्य के आगे तक पीड़ित परिजनों ने एंबुलेंस का दुखड़ा रोया था. लेकिन कोई हल नहीं निकला। मोर्चरी पहुंचे केंद्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री डॉ संजीव बालियान को पीड़ा सुनाई तो उन्होंने सीएमओ को तत्काल दस एंबुलेंस मोर्चरी भेजने के लिए फोन किया। मृतकों के परिजनों को अफसरों और सियासी पार्टी के नेताओं की दिलाशा तो मिलती रही, लेकिन बदइंतजामी के आंसू कोई नहीं पोछ पाया।