वीतराग संत ने गांव-गांव में जगाई शिक्षा की अलख
मुजफ्फरनगर। कर्मयोगी स्वामी कल्याणदेव ने निष्काम सेवा की अमिट गाथा लिखी। 300 से ज्यादा शिक्षण संस्थाएं स्थापित कर वीतराग संत ने ग्रामोत्थान के सपने को साकार किया। उनकी सादगी की संतई के दर्शन की चाह बड़े राजनीतिज्ञों को शुक्रताल खींच लाती थी।
तीन सदी के युगदृष्टा स्वामी कल्याणदेव को ब्रह्मलीन हुए 13 साल बीत चुके हैं, मगर उनकी अनूठी संत परंपरा अनुकरणीय और नैतिक मूल्यों से यशस्वी है। दस वर्ष की बाल्यावस्था में पैतृक गांव मुंडभर से साधु-संगत की मंडली के साथ घर त्याग आए स्वामी कल्याणदेव ने जीवन पर्यंत सेवा में ही मोक्ष की खोज की। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी, खादी की गांवों की चौपालों पर अलख जगाई। पचेंडा गांव में उन्होंने बड़ा यज्ञ कराकर लाल बहादुर शास्त्री, अलगूराय और भाई परमानंद की मौजूदगी में दलितों को यज्ञमान बनाया और मंदिरों में प्रवेश कराया। गुलामी की दास्तां से जकड़े देश को शिक्षित बनाने के लिए शिक्षा ऋषि ने वर्ष 1926 में मंसूरपुर के गांव दूधाहेड़ी में पहली पाठशाला की नींव रखी। स्वामी जी ने शिक्षा की ऐसी ज्योति जगाई कि किसान और मजदूरों के बच्चों के भविष्य निर्माण के लिए गांव-गांव स्कूल खोलने का महायज्ञ प्रज्वलित हो गया।
जनता इंटर कॉलेज भोपा में वर्ष 1967 में हुई जनसभा में तत्कालीन सीएम चौधरी चरण सिंह ने कहा था कि शिक्षा क्षेत्र में जो कार्य स्वामी कल्याणदेव ने किया, वह सरकार भी नहीं कर सकती। उनकी स्थापित संस्थाओं में हाईस्कूल से डिग्री कॉलेज तथा पालीटेक्निक से आयुर्वेदिक कॉलेज तक हैं। संत के त्याग और नि:स्वार्थ सेवा से देश के बड़े राजनीतिज्ञ भी अभिभूत हुए। वर्ष 1958 में शुक्रताल में कार्तिक पूर्णिमा गंगा मेले में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पधारे खे। पंडित नेहरू ने स्वामी कल्याणदेव को उत्तर प्रदेश का गांधी संबोधित किया। देश के पहले राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद ने स्वामी जी के आग्रह पर मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन पर ही अपनी स्पेशल ट्रेन रुकवाई और शुक्रताल का प्रसाद ग्रहण किया। प्लेटफार्म पर ही मंच सजा और राष्ट्रपति ने जिले की जनता से संवाद किया। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, इंदिरा गांधी, चौधरी चरणसिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह और अटलबिहारी वाजपेयी शिक्षा ऋषि की त्याग और सेवा के कायल रहे। भारतीय संत परंपरा के दिव्य संत कल्याणदेव की सरलता और सादगी ने उन्हें राष्ट्रीय फलक पर पहचान दी।
अलकंरण से हुए सुशोभित
(फोटो समाचार)
मुजफ्फरनगर। सेवा भावी संत कल्याणदेव के अमूल्य कार्यों का राष्ट्र ने भी सम्मान किया। वर्ष 1982 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। वर्ष 1993 में राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने स्वामी जी को पहला नंदा नैतिक पुरस्कार प्रदान किया। वर्ष 2000 में राष्ट्रपति केआर नारायणन ने महान संत को पद्म भूषण से अलंकृत किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने तीन सदी के युगदृष्टा अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन कर स्वामी जी के कृतित्व को अनूठा और बेमिसाल बताया था।
संत के पुरुषार्थ से
चमका शुकतीर्थ
(फोटो समाचार)
शुक्रताल। ऐतिहासिक एवं पौराणिक शुकतीर्थ का जीर्णोद्धार कर भारत के तीर्थ मानचित्र पर शुक्रताल को स्थापित करने का श्रेय स्वामी कल्याणदेव को है। इलाहाबाद कुंभ में संत महात्माओं ने उन्हें जो संकल्प दिलाया उसे पूरा करने के लिए कर्मयोगी ने जीवटता से पुरुषार्थ किया। व्यासनंदन महर्षि शुकदेव मुनि की तपोभूमि भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम में वर्षभर श्रीमद्भागवत कथा की अमृत वर्षा होती है। पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती कहते हैं कि गुरुदेव का हर क्षण दरिद्र नारायण की सेवा को अर्पित था।