दुनिया में शुक्रताल की एक अलग पहचान
मोरना। कथा व्यास स्वामी किरीट महाराज ने कहा कि शुक्रताल को देश और दुनिया में अलग पहचान मिली है। शुक्रताल के विकास नहीं होने पर उन्होंने दुख प्रकट करते हुए सरकार की योजनाओं को कठघरे में खड़ा किया।
कथा व्यास किरीट महाराज ने कहा कि जीवन को सुखी रखने के दो सूत्र हैं। भोजन साथ में, भजन भी साथ-साथ करना चाहिए। जीवन की भागदौड़ ने जीवन से परिवार वालों को दिए जाने वाला समय छीन लिया है। आधुनिकता के उपकरणों के चलते परिवार के संगठन में बिखराव आया। भौतिकवाद ज्यादा बढ़ गया है। दुख देकर सुख भोगना महापाप है। इस प्रकार के जघन्य अपराध है। कई देशों में इन अपराधों को रोकने के लिए फांसी की सजा तक का प्रावधान है। समस्या राष्ट्र की नहीं संस्कारों की है। संस्कार परिवार से मिलते हैं। युवा का धर्म, कर्म सामाजिक दबाव में है। परदेशी हवा से नई किस्म की पीढ़ी पर आचरण कर्म का अभाव होने लगा है। भागवत कथा सात दिन सुनने के बाद एक वर्ष में 358 दिन शेष बचते हैं। ऐसे में संस्कृति परिवेश को समय कम देना समाज के दिखावे को देखकर गाड़ी, मकान, पश्चिम सभ्यता के परवरिश में जीना हमें कुकर्म की ओर ले जा रहा है। छोटे अपराध से बड़ा अपराध का जन्म होता है। विदेशों में लोग कथा सुनकर कर्म करते हैं, भारत में सिर्फ सुनते हैं। आचरण में कमी है। धर्म की कीमत को विदेशी तो जानते हैं, वे इसकी अपेक्षा भी करते हैं। घर-घर में टीवी, इंटरनेट आने से दुनिया बदल गई है। 40 साल पहले कोका कोला, जींस और टीशर्ट आदि का चलन नहीं था, लेकिन लोग स्वस्थ और सुंदर होने के साथ-साथ ताकतवर भी थे। बड़े बूढ़ों की संगति से शांति और अच्छे विचारों का उदय होता है। साधुजन की संगति से सरलता के साथ छल कपट से दूर होने से जीवन संवर जाएगा। भारत में सत्य से जीत सकते हैं, झूठ से लाभ कम, नुकसान ज्यादा है। नीति तीन प्रकार की होती है। धर्मनीति, राजनीति, कूटनीति। एक जमाने में राजनीति धर्म थी, आज धर्म की राजनीति हो रही है। सियासत में राजनीति में झूठ बोलना से सम्मान कम, सर्व समाज और प्रजा का नुकसान हो रहा है। इसको रोकना होगा, तभी राष्ट्र का कल्याण होगा। भारत एक ऐसा देश है, जहां दुनिया के विभिन्न समुदाय के लोग बसे हुए हैं। उनमें सहन करने की क्षमता है। कानून सख्त होना जरूरी है, जीवन में इसका पालन करना ही हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए।