मुजफ्फरनगर। जिले की राजनीति में 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद बसपा का दबदबा कायम रहा। इस चुनाव में बसपा ने दो सीट जीती थीं। 2007 के चुनाव में बसपा छह में से तीन सीटों पर विजयी रही और सरकार बनाई। 2012 में प्रदेश में सपा की आंधी चली, लेकिन जिले में बसपा ही बड़ी पार्टी रही। लंबे समय बाद बसपा को 2017 में बड़ा झटका लगा, जब वह अर्श से फर्श पर पहुंच गई। यही नहीं पार्टी को तीसरे नंबर पर जाना पड़ा।
जिले की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी का 2002 से वर्चस्व शुरू हुआ। इससे पहले पार्टी के नेता चुनाव तो लड़े, लेकिन सफलता नहीं मिली। 2002 के चुनाव में बसपा को जिले में छह में से दो सीटें मिली। चरथावल से उमाकिरण और मोरना से राजपाल सैनी ने जीत हासिल की। इस चुनाव में दलित बसपा के पक्ष में पूरी तरह खड़ा हुआ दिखाई दिया और ओबीसी का 50 प्रतिशत से ज्यादा झुकाव बसपा की ओर रहा। बसपा की बढ़त के साथ ही भाजपा का ग्राफ कम होता चला गया। 2007 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में बसपा की सरकार बनी और जिले में भी छह में से तीन सीटें बसपा को मिली। सरकार में जिले के दो मंत्री भी शामिल हुए। खतौली से योगराज सिंह और जानसठ से डॉ यशवंत सिंह मंत्री बनने वालों में शामिल रहे।
चरथावल से अनिल कुमार बसपा से ही विधायक बने। जिन सीटों पर बसपा हारी, वहां भी उसका प्रदर्शन अच्छा रहा। 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के कादिर राना मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुए। जिला पंचायत अध्यक्ष भी जिले में बसपा समर्थित महिला इंतखाब राना रहीं। 2012 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे प्रदेश में सपा की लहर थी, तब भी यहां बसपा ही नंबर वन पार्टी रही। मीरापुर, पुरकाजी, चरथावल विधानसभा सीट बसपा ने जीती। मीरापुर से मौलाना जमील अहमद, चरथावल से नूरसलीम राना और पुरकाजी से अनिल कुमार चुनाव जीते। 2017 में 15 साल बाद बसपा को अर्श से फर्श पर वापस लौटना पड़ा। मुस्लिमों को तरजीह दिए जाने से बसपा का ओबीसी वोट बीजेपी की ओर खिसक गया। हालात ऐसे बने कि मुस्लिम तो चले गए सपा पर और ओबीसी चला गया बीजेपी के साथ। बसपा के साथ केवल दलित रह गया। पहले नंबर की पार्टी खिसक कर जिले में तीसरे नंबर पर चली गई।