मुजफ्फरनगर। शुकतीर्थ से गंगा बैराज तक का क्षेत्र वर्तमान में भेड़ों और भेड़ पालकों से भरा है। लगातार भेड़ पालकों का पहुंचना जारी है। सहारनपुर से मुजफ्फरनगर-बिजनौर बॉर्डर पर बह रही गंगा तक उनका यह सफर हर साल होता है। तीन महीने यहां रुकते हैं और लौट जाते हैं। भेड़ पालकों की यह जहमत भेड़ों को बचाने के लिए होती है। बताते है कि सहारनपुर में आम के बागों में छिड़का जाने वाला कीटनाशक उनकी भेड़ाें के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। यहीं वजह उनके इस पलायन की है।
फल पट्टी के नाम से मशहूर सहारनपुर में आम के बागों की बहुतायत है। रामपुर मनिहारन, चकवाली, सदासपुर, हंगावली, सरदौली, संगाठेड़ा, झीखड़ा, अंबेहटा और नकुड़ आदि क्षेत्रों में भेड़ पालन भी खूब होता है। चारागाह नहीं होने के कारण ज्यादातर बागों में ही भेड़ों को चराया जाता। इन दिनों आम पर बौर आता है। कोई बीमारी या कीट न लगे इसके लिए कीटनाशकों व अन्य दवाओं का छिड़काव किया जाता है। भेड़ें कीटनाशकों के प्रति बेहद संवेदनशील होती है। संपर्क में आते ही उनकी मौत हो जाती है। इसके चलते लोग अपनी भेड़ों को लेकर गंगा की ओर निकल पड़ते हैं। मुजफ्फरनगर के शुकतीर्थ से गंगा बैराज तक गंगा के किनारे डेरा जमा लेते हैं। 80 से 100 भेड़ पालक हजारों की संख्या में भेड़ों को लेकर पहुंचते हैं और यहीं डेरा डालकर रहते हैं। तीन माह तक यहां रहने के बाद अपने घरों को लौट जाते हैं।
पानी उतरने से खूब मिलती है घास
इन दिनों गंगा में पानी कम होने लगता है। भेड़ों के चरने को किनारे पर घास भी खूब रहती है। भेड़ों के झुंड बैराज से शुकतीर्थ के बीच चरते रहते हैं। भेड़ पालक भी जगह-जगह झोपड़ियां डालकर अपना ठिकाना बना लेते हैं।
करीब 15 साल से आ रही समस्या
भेड़ों को लेकर पहुंचे रामपुर मनिहारन के बुजुर्ग कृष्णपाल का कहना है कि पहले उनके सामने यह समस्या नहीं थी। करीब 15 साल से कीटनाशकों का ज्यादा छिड़काव हो रहा है। कीटनाशक के छिड़काव के कुछ देर बाद तक भेड़ें वहां से निकलती हैं तो वह लंगड़ी हो जाती हैं। ज्यादा असर होने पर मर जाती हैं। उनके साथ आए प्रकाश का कहना है कि करीब दस साल से वह इस क्षेत्र में अपनी भेड़ों को लेकर आते हैं। खाने-पीने का सामान लादने को एक गधा साथ रखते हैं। बीच-बीच में गांव से कोई न कोई आता रहता है। मंजू का कहना है कि कुछ लोग मेरठ की ओर सड़कों के किनारे भी भेड़ों को लेकर जाते हैं, लेकिन ज्यादातर गंगा के किनारे ही आते हैं। यहां घास भरपूर रहती है।
बौर से फल तक का समय संवेदनशील
आम की फसल में बौर से फल लगने तक समय संवेदनशील होता है। प्रभारी डीएचओ नरेंद्र सिंह का कहना है कि इस दिनों भुनगा एवं मिज कीट के अलावा खर्रा रोग का प्रकोप होता है। इसकी रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड, क्लारपोइरीफास, डायमेथोएट, ट्राईडोमार्फ, डायनोकेप की निर्धारित मात्रा के छिड़काव की सलाह दी जाती है।
भेड़ें रसायनों के प्रति संवेदनशील होती है। कई बार तो इनकी खुशबू से ही भेड़ों की मौत हो जाती है। कुछ वर्ष पूर्व बुढ़ाना में कीटनाशक छिड़के हुए खेत में चरने से 130 भेड़ों की मौत हो गई थी। इन दिनों गंगा के किनारे घास की अच्छी रहती है। इसलिए भी लोग अपनी भेड़ों को लेकर यहां पहुंचते हैं। - डा. हुकम सिंह, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी।
कीटनाशकों की अधिकता मानव के लिए खतरनाक
मुजफ्फरनगर। फसलों में कीटनाशकों का बेजां इस्तेमाल मानव जीवन के लिए भी खतरनाक होता है। फसलों में बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करते रहने से यह विघटित नहीं होते और फलों, सब्जियों में इनका असर आ जाता है। वरिष्ठ फिजीशियन डा. लोकेश गुप्ता का कहना है कि कीटनाशकों का विषैला प्रभाव शारीरिक दोष उत्पन्न करता है। किडनी, लीवर एवं पेट से संबंधित रोग पैदा करते हैं। आंखों और त्वचा को भी नुकसान पहुंचाते हैं।