सूबे में हाउस टैक्स जमा होने के आधार पर शहरों का विकास कराया जाएगा।
शहर के किनारे अनियमित ढंग से बसने वाली कालोनियों पर रोक लगाने और निकायों का खजाना भरने के लिए शहरी विकास के नए मानक तय किए जा रहे हैं।
इस संबंध में प्रारंभिक दौर की चर्चा हो चुकी है। निकायों का मुख्य स्रोत हाउस टैक्स है, लेकिन यह भी सौ फीसदी जमा नहीं हो पा रहा है।
मगर नई व्यवस्था से शहरों में हाउस टैक्स की वसूली बढ़ जाएगी।
शहरी क्षेत्रों में विकास के लिए निकायों का गठन किया गया है। इसमें नगर निगम, पालिका परिषद और नगर पंचायतें हैं।
इनका मुख्य काम शहरी क्षेत्र के लोगों को बेहतर नागरिक सुविधा उपलब्ध कराना है। जैसे सड़क, सीवर, जलापूर्ति, स्ट्रीट लाइट के साथ सफाई व्यवस्था आदि।
निकाय इसके एवज में हाउस टैक्स के साथ वाटर टैक्स, सीवरेज चार्ज और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से कुछ शुल्क वसूली करते हैं। निकाय स्वायत्तशासी संस्थाएं हैं और ये अपने संसाधन से चलते हैं।
लिहाजा सरकार इसे पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। जवाहर लाल नेहरू अरबन नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) योजना की शर्तों में भी यह शामिल है।
इसलिए नगर विकास विभाग चाहता है कि हाउस टैक्स वसूली के आधार पर विकास कार्य कराया जाए। मसलन यदि कोई निजी क्षेत्र में कोई सोसायटी बस रही है और वहां पर कोई मकान नहीं बना है तो कोई विकास न कराया जाए।
मकान बनने और उनको हाउस टैक्स के दायरे में लाने के बाद विकास कराया जाए। जिस सोसायटी से सौ फीसदी हाउस टैक्स की वसूली हो रही है, वहां विकास के सभी काम कराए जाएं।
सौ फीसदी हाउस टैक्स की वसूली न होने वाली कालोनियों में केवल बहुत जरूरी विकास ही कराए जाएं। हालांकि, अभी इस पर अंतिम फैसला किया जाना बाकी है।