किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई, मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में मां आई। सादा जुबान में ऐसे गंभीर शेर कहने वाले शायर मुनव्वर राना असल जिंदगी में भी अपने हिस्से में सिर्फ मोहब्बतें चाहते थे। बात 1988 की है, जब स्थानीय शायर कशिश वारसी के निमंत्रण पर पहली बार मुनव्वर याद-ए-दिगर मुशायरे में मुरादाबाद आए थे।
मुरादाबाद निवासी वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. माहेश्वर तिवारी ने देश के कई शहरों में मुनव्वर राना के साथ मंच साझा किया है। डॉ. माहेश्वर बताते हैं कि मुनव्वर प्यार से उन्हें भाईजान कहते थे। गंभीर बीमारी का पता उन्हें बहुत पहले चल गया था लेकिन कहते थे कि भाईजान जितनी जिंदगी है उसे खुलकर जिएंगे।
जिगर मंच पर आयोजित प्रदर्शनी के मुशायरे में एक बार जब मुनव्वर राना मुरादाबाद आए तो माहेश्वर तिवारी की पोती भाषा उनसे मिलने पहुंचीं। भाषा ने अपना परिचय दिया तो मुनव्वर ने उन्हें अपनी किताब दी और कहा कि यह भाईजान तक पहुंचा देना।
कशिश वारसी बताते हैं कि मुरादाबाद के कई मुशायरों में मुनव्वर राना ने अपना कलाम पेश किया है। साल 2012 से 15 के मुरादाबाद में आयोजित प्रदर्शनी के मुशायरे में वह आए थे। तब उन्होंने अपनी प्रसिद्ध गजल पढ़ी थी जिसका शेर है कि तो अब इस गांव से रिश्ता हमारा खत्म होता है, फिर आंखें खोल ली जाएं कि सपना खत्म होता है।