डेढ़ दशक तक पत्नी बीना अग्रवाल के चुनाव मैनेजर की भूमिका निभाने वाले भाजपा नेता विनोद अग्रवाल शुक्रवार को खुद मेयर बन गए। बीना अग्रवाल की आकस्मिक मौत से उपजी सहानुभूति की लहर और बहू प्रिया अग्रवाल की अचानक राजनीति में अप्रत्याशित सक्रियता ने उन्हें मेयर का ताज पहना दिया।
हालांकि संगठन के भीतर से उठ रहे विरोध के स्वर शुरू में सीट फंसने का संकेत दे रहे थे लेकिन ऐन वक्त पर सपा के भीतर मचे घमासान ने विनोद की जीत में अहम रोल निभा दिया।
विनोद अग्रवाल इससे पहले खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़े। उन्होंने तीन बार अपनी पत्नी बीना अग्रवाल को मेयर का चुनाव लड़ाया, जिसमें दो बार वो जीतकर मेयर बनीं। गंभीर छवि की वजह से बीना की संगठन और पब्लिक के बीच स्वीकार्यता रही। लेकिन विनोद अग्रवाल के लिए माहौल इतना आसान नहीं था।
महापौर उपचुनाव की घोषणा होते ही पार्षदों ने उनके नाम पर विरोध शुरू कर दिया था। बहरहाल संगठन ने विरोध को दरकिनार करके विनोद को चुनाव मैदान में उतार दिया। लेकिन अंदरखाने विनोद का विरोध जारी रहा।
उधर, सपा और कांग्रेस ने हिंदू प्रत्याशी घोषित किया तो विनोद की मुश्किलें और बढ़ती दिखीं। लेकिन ऐन वक्त पर सपा में हुई बगावत ने विनोद का रास्ता साफ कर दिया। कैसर अली कुद्दूसी, जावेद अंसारी और शीरी गुल के मैदान में आने से मुस्लिम वोट बंटे और विनोद की जीत का रास्ता आसान हुआ।
कैसर अली को 18750, शीरी गुल को 2640 , शकील अहमद को 5748 और जावेद अंसारी को 532 वोट मिले हैं। विनोद की जीत में दूसरी बड़ी भूमिका मुस्लिम वोटरों की सुस्ती ने निभाई जो पोलिंग के दिन बूथ से किनारा किए रहे।
सपा प्रत्याशी राजकुमार प्रजापति 30720 वोटों पर निपट गए। उधर, विनोद अग्रवाल की बहू प्रिया अग्रवाल ने डोर टू डोर जनसंपर्क करके महिला वोटरों को घरों से निकालने में अहम रोल निभाया।