1962 से दस्तकारी के सामान्य प्रशिक्षु की तरह काम की शुरुआत करने वाले बाबूराम यादव उम्र के साथ अपनी कला को निखारते गए। कुछ वर्षों में उनके हाथों से तैयार उत्पाद निर्यात मेलों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकने लगे।
पीतलनगरी के निर्यातकों के बीच उनके उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ने लगी। काम के साथ नाम बढ़ने पर बाबूराम यादव को 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के हाथों शिल्प गुरु सम्मान मिला था। इससे पहले उन्हें हस्तशिल्प के लिए नेशनल और स्टेट अवार्ड भी प्राप्त हो चुके हैं।
ब्रास पर नक्काशी का काम
पद्म श्री पुरस्कार के लिए चयनित शिल्प गुरु बाबूराम यादव ने 1962 से ब्रास पर नक्काशी का काम कर रहे हैं। धीरे धीरे इनकी शोहरत राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई। भारत सरकार और प्रदेश सरकार की तरफ से आयोजित फेयर में भी बाबूराम जाते थे। एक प्लेट पर नक्काशी के चलते इनको काफी ख्याति मिली।
अमर सिंह से सीखा था नक्काशी का ककहरा
बंगला गांव के रहनेवाले शिल्प गुरु बाबूराम यादव पढ़ाई के बाद अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए हरपालनगर में रहने वाले शिल्प के गुरु अमर सिंह के पास 1962 में गए। यहां उन्होंने अमर सिंह से नक्काशी का ककहरा सीखा। कम समय में बाबूराम ब्रास के प्लेट पर एंग्रेविंग करना सीख गए। अमर सिंह ने शहर के कई लोगों को पीतल की नक्काशी का हुनर सिखाया है।
1992 से अवार्ड मिलना शुरू हुआ
शिल्प गुरु बाबूराम यादव ने बताया कि उनके काम का परिणाम 1992 से मिलना शुरू हो गया। सबसे पहले उनको नेशनल अवार्ड मिला। इसके बाद 1995 में शिल्प के क्षेत्र में स्टेट अवार्ड मिला। 2014 में खुशी तब बढ़ गई, जब उनको तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने शिल्प गुरु अवार्ड से सम्मानित किया।
बेटे भी विरासत को संभालने में जुटे
पिता के साथ बाबू राम के बेटे अशोक यादव, हरिओम यादव, चंद्र प्रकाश यादव अपने पिता की विरासत को संभालने में जुट गए। बेटे भी पिता से सीखते हुए काफी हुनरमंद हो गए हैं। बेटों का कहना है कि उनके पिता के कला की कद्र अब होने लगी है।
सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्री को भेजते हैं माल
शिल्प गुरु बाबू राम यादव अपना माल दिल्ली स्थित सेंट्रल काॅटेज इंडस्ट्री को लगातार भेजते रहे। यहां से उनकी पहचान बढ़ती चली गई। लोगों ने पीतल की नक्काशी का लोहा मान लिया।